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उत्तर पूरी पुरूष जाति के पास नहीं

एक फेसबुक-मित्र द्वारा शेयर की गई एक प्रेरक कहानी---

 एक अमीर आदमी की शादी एक बुद्धिमान स्त्री से हुई।
अमीर हमेशा अपनी बीवी से तर्क और वाद-विवाद मेँ हार जाता था।
बीवी ने कहा कि स्त्रियाँ मर्दों से कम नहीँ..
अमीर ने कहा मैँ दो वर्षो के लिये परदेश चला जाता हूँ।
एक महल,बिजनेस मेँ मुनाफा और एक बच्चा पैदा करके दिखा दो।
आदमी परदेश चला गया...
बीवी ने सारे कर्मचारियों में ईमानदारी का बोध जगा कर मेहनत का गुण भर दिया।
पगार भी बढ़ा दी।
सारे कर्मचारी खुश होकर दिल लगा कर काम करने लगे।
मुनाफा काफी बढ़ा...
बीवी ने महल बनवा दिया..
बीवी ने दस गायें पालीं..
उनकी काफी खातिरदारी की...
गायों का दूध काफी अच्छा हुआ..
दूध से दही जमा के परदेश मेँ दही बेचने चली गई वेश बदल के..
अपने पति के पास बदले वेश में दही बेचा...और रूप के मोहपाश में फँसा कर सम्बन्ध बना लिया। एक दो बार और सम्बन्ध बना के अँगूठी उपहार में लेकर घर लौट आई।
बीवी एक बच्चे की माँ भी बन गई।
दो साल पूरे होने पर पति घर आया।
महल और शानो-शौकत देखकर पति दंग और प्रसन्न हो गया।
मगर जैसे ही बीवी की गोद मेँ बच्चा देखा, क्रोध से चीख उठा- 'किसका है ये?'
बीवी ने जब दही वाली गूजरी की याद दिलाई और उसकी दी अँगूठी दिखाई तो अमीर काफी खुश हुआ।
बीवी ने कहा-
'अगर वो दही वाली गूजरी मेरी जगह कोई और होती तो???'
इस 'तो' का उत्तर तो पूरी पुरूष जाति के पास नहीं है।
'नारी नर की सहचरी, उसके धर्म की रक्षक, उसकी गृहलक्ष्मी तथा उसे देवत्व तक पहुँचानेवाली साधिका है।' – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्

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