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Showing posts with the label कविता

विषय एक - रचनाएँ दो (लघुकथा और कविता )

      एक खामोशी  (लघुकथा) सड़क शांत थी। पेड़ों की छाया लंबी होकर दोनों बच्चों के करीब उतर आई थी। एक बच्चा नंगे पाँव, मैले कपड़ों में लकड़ी के एक डिब्बे पर बैठा था। दूसरा, साफ़, उजले कपड़ों में उसके सामने एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा था। पॉलिश की गंध हवा में घुल रही थी। लड़के के हाथ छोटे थे, पर गति में बिजली थी। ब्रश जूते पर ही नहीं, उसके खयालों में भी चलता जा रहा था। “तुम स्कूल जाते हो?” -खड़े लड़के ने अचानक पूछा। बैठे लड़के का हाथ क्षण भर के लिए रुका - “पहले जाता था।” “अब क्यों नहीं?” कुछ पल चुप्पी रही। बह रही हवा ने पेड़ों के पत्तों को छुआ और टकराकर लौट गई। खड़े लड़के ने दूसरा जूता आगे बढ़ा दिया। काम पूरा हुआ और खड़े लड़के ने जेब से पैसे निकाले। बैठे लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया। एक क्षण के लिए हाथों का स्पर्श… फिर, एक खामोशी ! पर हाँ, उस एक स्पर्श ने संवाद पूरा कर दिया। खड़ा लड़का उसके स्कूल चला गया। दूसरा लड़का वहीं बैठा रहा। पेड़ वहीं रहे, सड़क वहीं रही, बस बैठे लड़के की निगाह सड़क के इस ओर से उस ओर घूमती रही। ***** कविता    फासला   एक सड़क, दो बच्चे,...

डायरी के पन्नों से ..."स्वतंत्रता-दिवस...(?)"

           15अगस्त का पावन दिवस- सन् 1947 में हमें अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिल गई, हम स्वाधीन हो गए। लेकिन... लेकिन क्या हम सच में स्वतन्त्र  हैं ?        हम आज भी स्वतन्त्र नहीं हैं, आज भी हमारे कई भाई-बहिन आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में परतन्त्र हैं। आज भी सफ़ेदपोश एक बड़ा तबका आम आदमी का रहनुमा बना हुआ है। देशी अंग्रेजों की हुकूमत आज भी अभावग्रस्त लोगों को त्रस्त कर रही है।       सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले, मेरी कविता के नायक 'मंगू' की वेदना को मैंने कविता लिखते वक़्त महसूसा है। अब...अब आप भी महसूस करना चाहेंगे न इस अहसास को ?              ( मेरी यह कविता वर्ष 2012 में आकाशवाणी, उदयपुर से प्रसारित हुई थी। )                                                               ...

जय माँ शारदे! (स्तुति)

     'बसन्त पञ्चमी' के पुनीत पर्व पर मैं अपने शब्द-पुष्पों से सृजित "सरस्वती वन्दना" अपने प्रिय मित्रों व अन्य सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ :-                                                                                                                          *****

डायरी के पन्नों से ..."प्रियतमे, तब अचानक..." (कविता)

                  विरहाकुल हृदय प्रकृति के अंक में अपने प्रेम को तलाशता है, उसी से प्रश्न करता है  और उसी से उत्तर पाता है।  मन के उद्गारों को अभिव्यक्ति दी है मेरी इस कविता की  पंक्तियों ने।  कविता की प्रस्तुति से पहले इसकी रचना के समय-खण्ड को भी उल्लेखित करना चाहूँगा।  मेरे अध्ययन-काल में स्कूली शिक्षा के बाद का एक वर्ष महाराजा कॉलेज, जयपुर में अध्ययन करते हुए बीता। इस खूबसूरत वर्ष में मैं टी. डी. एस. प्रथम वर्ष (विज्ञान) का विद्यार्थी था। इसी वर्ष मैं कॉलेज में 'हिंदी साहित्य समाज' का सचिव मनोनीत किया गया था। मेरा यह पूरा वर्ष साहित्यिक गतिविधियों के प्रति समर्पित रहा था और यह भी कि मेरी कुछ रचनाओं ने इसी काल में जन्म लिया था। साहित्य-आराधना के साइड एफेक्ट के रूप में मेरा परीक्षा परिणाम 'अनुत्तीर्ण' घोषित हुआ। मुझे पूर्णतः आभास हो गया था कि अध्ययन सम्बन्धी मेरा भविष्य मुझे यहाँ नहीं मिलने वाला है, अतः मैंने  जयपुर छोड़कर रीजनल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, अजमेर में प्रवेश लिया। वहाँ की आगे की कहानी अभी न कह कर, इसका ...

'सागर और सरिता' (कविता)

स्नेही पाठकों, प्रस्तुत है मेरे अध्ययन-काल की एक और रचना---     “सागर-सरिता संवाद” सागर-  कौन हो तुम, आई कहाँ से? हृदय-पटल पर छाई हो।  कहो, कौन अपराध हुआ,  इस तपसी को भाई हो।    गति में थिरकन, मादक यौवन, प्रणय की प्रथम अंगड़ाई हो। मेरे एकाकी जीवन में, तुम ही तो मुस्काई हो। तुम छलना हो, नारी हो, प्रश्वासों में है स्पंदन।  कहो, चाह क्या मुझसे भद्रे, दे सकता क्या मैं अकिंचन? सरिता- तुम्हारे पवन चरणों की रज, मुझे यथेष्ट है प्रियतम।  मुझको केवल प्रेम चाहिए, तन की प्यास नहीं प्रियतम। तुम ही से जीवन है मेरा, होता संशय क्यों प्राणेश? प्रकृति का नियम है यह तो, हमारा मिलन ओ हृदयेश।।  *******     

तुम आओ तो... (कविता)

      हृदय में कुछ भाव उमड़े, भावों ने श्रृंगार रस में डूबे शब्दों का रूप लिया और अन्ततः इस कविता ने जन्म लिया। प्रस्तुत कर रहा हूँ अपने रस-मर्मज्ञ, स्नेही पाठकों के लिए...                     "तुम आओ तो..." ठुकरा दे गर कोई अपना, तुम किञ्चित ना घबराना, पथ भूल न जाना मेरा तुम, मेरे पास चली आना, बस जाना मेरी आँखों में, पलकों की सेज बिछा दूँगा, तुम आओ तो! दुनिया रोके मेरी राहें, चाहे उल्टी घड़ियाँ हों, जंजीर पड़ी हो पाँवों में, हाथों में हथकड़ियाँ हों, सारे बंधन तोड़ूँगा  मैं, बाधा हर एक मिटा दूँगा, तुम आओ तो! प्यासी हो धरती कितनी भी, छाती उसकी तपती हो, आसमान से शोले बन कर, चाहे आग बरसती हो, मौसम हो पतझड़ का तो भी, मैं दिल को चमन बना दूँगा, तुम आओ तो! वसन कभी जो काटें तन को, हृदय कभी जो घबराये, आभूषण भी बोझ लगें जब, मन उनसे भी कतराए, मैं सूरज, चांद, सितारों से, तुम्हारे अंग सजा दूँगा, तुम आओ तो! जब तन में, मन में हो भटकन, सखियों से मन न...

डायरी के पन्नों से..."मेरे आँगन में धूप नहीं आती..."

     समर्पित है मेरी यह कविता, CRPF के उन वीर जवानों को, जो फरवरी, 2019 में पुलवामा (कश्मीर) में पाकिस्तानी आतंककारियों के द्वारा प्रशिक्षित एक स्थानीय गद्दार के आत्मघाती हमले की चपेट में आकर काल-कवलित हो गये; जो चले गए यह कसक लेकर कि काश, जाने से पहले कुछ पापियों को ऊपर पहुँचा पाते!                                                   'मेरे आँगन में धूप नहीं आती...'    मेरे आँगन के छोटे-बड़े पौधे जिन्हें लगाया है पल्लवित किया है मेरे परिवार ने, बड़े जतन से, जो दे रहे हैं मुझे जीवन चिन्ताविहीन हूँ कि वह जी रहे हैं मेरे लिए। वह जी रहे हैं मेरे लिए, पर उन्हें भी तो चाहिए मेरा प्यार, दुलार और संरक्षण। मैं नहीं दे रहा जो उन्हें चाहिए, मुझे तो बस उन्हीं से चाहिए, अपेक्षा है तो उन ही से। अपनी पंगुता पर, अपनी विवशता पर, झुंझलाता हूँ जब, तो दोषी ठहराता हूँ दूर गगन के बादलों को। हाँ, दोषी हैं वह भी, ढँक लेते हैं सूरज को और नहीं मिल पाती धूप, मेरे आँगन...

डायरी के पन्नों से ... "आधुनिक मित्र" (हास्य कविता)

रीजनल कॉलेज, अजमेर में प्रथम वर्ष के अध्ययन-काल के दौरान लिखी गई मेरी इस हल्की-फुल्की हास्य कविता को मेरे साथियों-परिचितों ने बहुत सराहा था। प्रस्तुत कर रहा हूँ यह कविता आप सब के लिए---      "आधुनिक मित्र" सोचा  मैंने  मिलूँ  मित्र से, मौसम  बड़ा  सुहाना  था। कृष्ण-सुदामा के ही जैसा, रिश्ता  बड़ा  पुराना  था। मज़ा लिया तफ़री का मैंने, टैक्सी को  रुपया दे कर। भौंहें उसकी चढ़ी हुई थीं, जब पहुँचा मैं उसके घर। मैंने समझा उन साहब को मेरा  आना  अखरा  था। पर उनके गुस्से का कारण, एक  जनाना  बकरा  था। पूछा मैंने जरा सहम कर. 'हो  उदास  कैसे  भाई ?' जरा तुनककर वह भी बोला, 'आफत अच्छी  घर आई।' चौंक पड़ा मैं, बोला उससे, 'अमां यार, क्या बकते हो! अरसे से मिलने आया हूँ, मुझको आफत कहते हो!' तब वह बोला थोड़ा हँसकर, 'तुम  यार,  बड़े  भोले  हो। बस  उल्लू के पट्ठे  हो  या, कुछ  दिमाग़  के पोले  हो। मेरी बकरी ही आफत है, बस  घाटे  का ...