“Mother’s day” के नाम से मनाये जा रहे इस पुनीत पर्व पर मेरी यह अति-लघु लघुकथा समर्पित है समस्त माताओं को और विशेष रूप से उन बालिकाओं को जो क्रूर हैवानों की हवस का शिकार हो कर कभी माँ नहीं बन पाईं, असमय ही काल-कवलित हो गईं। ‘ऐसा क्यों’ आकाश में उड़ रही दो चीलों में से एक जो भूख से बिलबिला रही थी, धरती पर पड़े मानव-शरीर के कुछ लोथड़ों को देख कर नीचे लपकी। उन लोथड़ों के निकट पहुँचने पर उन्हें छुए बिना ही वह वापस अपनी मित्र चील के पास आकाश में लौट आई। मित्र चील ने पूछा- “क्या हुआ, तुमने कुछ खाया क्यों नहीं ?” “वह खाने योग्य नहीं था।”- पहली चील ने जवाब दिया। “ऐसा क्यों?” “मांस के वह लोथड़े किसी बलात्कारी के शरीर के थे।” -उस चील की आँखों में घृणा थी। **********
बरसों के बाद बरसों के बाद वह सामने खड़ी थी- उसी अधूरी मुस्कान के साथ, जिसे मैं छोड़ आया था समय के किसी मोड़ पर। आँखों में सवाल नहीं थे, होंठों पर शिकवा भी नहीं, बस एक अनकही दास्तां, जो अब भी वैसी ही थी। मैंने देखा उसे और उसने मुझे- जैसे दो टूटी हुई पंक्तियाँ फिर से कविता बन जाएँ। वक़्त बीच में बहुत कुछ लिख गया, झुर्रियाँ, तजुर्बे, तन्हाइयाँ… पर दिल की किताब में दर्ज था अब भी नाम वही पहला-पहला। हम बोले नहीं, क्योंकि कुछ मुलाक़ातें आवाज़ नहीं माँगतीं, सुनती हैं सिर्फ़ धड़कनें। बरसों के बाद दो दिल आमने-सामने थे- और साथ में थी, मौन में लिपटी हुई एक पूरी उम्र। ***** © 2026 गजेन्द्र भट्ट 'हृदयेश' | सर्वाधिकार सुरक्षित।