Skip to main content

Posts

मेरी पसन्द ...

"ऐसा क्यों" (लघुकथा)

                                   “Mother’s day” के नाम से मनाये जा रहे इस पुनीत पर्व पर मेरी यह अति-लघु लघुकथा समर्पित है समस्त माताओं को और विशेष रूप से उन बालिकाओं को जो क्रूर हैवानों की हवस का शिकार हो कर कभी माँ नहीं बन पाईं, असमय ही काल-कवलित हो गईं। ‘ऐसा क्यों’ आकाश में उड़ रही दो चीलों में से एक जो भूख से बिलबिला रही थी, धरती पर पड़े मानव-शरीर के कुछ लोथड़ों को देख कर नीचे लपकी। उन लोथड़ों के निकट पहुँचने पर उन्हें छुए बिना ही वह वापस अपनी मित्र चील के पास आकाश में लौट आई। मित्र चील ने पूछा- “क्या हुआ,  तुमने कुछ खाया क्यों नहीं ?” “वह खाने योग्य नहीं था।”- पहली चील ने जवाब दिया। “ऐसा क्यों?” “मांस के वह लोथड़े किसी बलात्कारी के शरीर के थे।” -उस चील की आँखों में घृणा थी।              **********
Recent posts

जिजीविषा (कहानी)

जिजीविषा   जिजीविषा-- यह केवल जीवन की इच्छा नहीं, बल्कि उस अदम्य ज्वाला का नाम है, जो मृत्यु के साये में भी जीवन का संकल्प बनकर धधकती है। यह कहानी है दो मासूम भाई-बहन की, जो भूख, भय और अंधेरे से घिरे हैं। उनके भीतर है एक ऐसी जिजीविषा जो उन्हें टूटने नहीं देती। जब शब्द चुप हो जाते हैं, तब आँखें बोलती हैं। जब पेट की ज्वाला हड्डियों तक पहुँचती है, तब आत्मा संघर्ष का शंखनाद करती है। सुबह के आठ बज रहे थे। कस्बे के बाहरी इलाके में रहने वाले भाई-बहन, रवि और रीना अपने घर से  नाश्ता कर के बाहर खेलने निकल पड़े थे। उनकी माँ अपने कामों में व्यस्त थी। सूरज की किरणें कस्बे की गलियों में फैल रही थीं। रवि बारह वर्ष की उम्र का था और रीना आठ वर्ष की थी। रवि हमेशा छोटी बहन रीना का बहुत ख़याल रखता था। रीना शरारती थी, लेकिन अपने भाई को बहुत प्यार करती थी। वह भाई से कभी जुदा नहीं रह सकती थी। दोनों खेलते-खेलते अपनी ही धुन में, कस्बे के बाहर एक सुनसान रास्ते पर बढ़ते चले गए। रास्ते से कुछ दूरी पर वहाँ एक पुराना गोदाम था, जो किसी व्यवसायी का था। गोदाम महीनों में खुला करता था। इसके दरवाज़े का एक प...

विषय एक - रचनाएँ दो (लघुकथा और कविता )

  लघुकथा  एक खामोशी सड़क शांत थी। पेड़ों की छाया लंबी होकर दोनों बच्चों के करीब उतर आई थी। एक बच्चा- नंगे पाँव, मैले कपड़ों में लकड़ी के एक डिब्बे पर बैठा था। दूसरा- साफ़ कपड़ों में उसके सामने एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा था। पॉलिश की गंध हवा में घुल रही थी। लड़के के हाथ छोटे थे, पर गति में बिजली थी। ब्रश जूते पर नहीं, जैसे उसके खयालों में उतरता जा रहा हो। “तुम स्कूल जाते हो?” -खड़े लड़के ने अचानक पूछा। बैठे लड़के ने सिर हिलाया- “पहले जाता था।” कुछ पल चुप्पी रही। फिर खड़े लड़के ने दूसरा जूता आगे बढ़ा दिया। काम पूरा हुआ। खड़े लड़के ने पैसे बढ़ाए, बैठे लड़के ने हाथ बढ़ाया - उसी क्षण दोनों की उँगलियाँ छू गईं। फिर, एक खामोशी ! सड़क वही रही, पेड़ वही रहे, पर उस एक स्पर्श में दोनों अपनी कहानी कह गए।  ***** कविता    फासला   एक सड़क, दो बच्चे, और उम्र- दोनों की बराबर। एक के हाथ में ब्रश, दूसरे के पैरों में जूते, बीच में चुप्पी का एक फासला ! पेड़ गवाही दे रहे हैं कि धूप किसी का भेद नहीं जानती, पर छाया हमेशा किसी एक के हिस्से ज़्यादा आती है। एक झुका है, दूसरा खड़...

श्राद्ध (लघुकथा)

अभिजीत तन्मय हो कर वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों को खाना खिला रहा था। परोसगारी में आश्रम का एक कर्मचारी राघव भी उसकी मदद कर रहा था।  "हाँ जी, आ जाइये।" -दरवाज़े पर एक व्यक्ति को खड़ा देख राघव ने कहा।   अभिजीत ने पलट कर देखा, उसका चचेरा भाई परेश आया था।  "भाई साहब, भाभी ने मुझे बताया कि आप यहाँ हैं, जबकि मैंने पहले ही आपको सूचित कर दिया था कि आज सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध है और मेरे यहाँ ब्राह्मण-भोज होगा। आपको भी भाभी के साथ मैंने अपने यहाँ निमंत्रित किया था न! मैं आपको लेने आया हूँ।" -परेश आते ही बोला।  "परेश, तुम उन पूर्वजों की शांति के लिए यह श्राद्ध करते हो, जिन्हें तुमने नहीं देखा, जबकि चाचा जी को वृद्धावस्था में अकेले छोड़ कर तुम अपने बीवी-बच्चों के साथ पृथक फ्लैट में रहते हो। क्या यह युक्तिसंगत है?... इन बुज़ुर्गों को देख रहे हो परेश? इनमें से कुछ लोग तो अपनी संतान के दुर्व्यवहार के कारण यहाँ हैं और कुछ को उनकी औलादों ने ही यहाँ छोड़ रखा है। ..." परेश और राघव चुपचाप खड़े अभिजीत को सुन रहे थे। अभिजीत ने कहना जारी रखा- "इन लोगों के न रहने पर इनकी औलादें द...

विनम्र श्रद्धांजलि !

    चींटियों के झुण्ड की तरह उमड़ता जन-सैलाब! प्रशासन भी आखिर संभाले तो कैसे, इस अंधी आस्था को? कुछ लोग इसमें शामिल होकर मोक्ष प्राप्त कर ही लेते हैं, अपने पीछे रोते-बिलखते निकट संबंधियों को छोड़ कर।… और धर्मांध लोगों को प्रेरित करने वाले निर्मोही तथाकथित संत और कथावाचकों ( निर्मोही इसलिए कि वह तो तथाकथित रूप से मोह-माया छोड़ जो चुके हैं ) के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। वैसे भी वह कानों से ज़्यादा काम नहीं लेते, केवल उनकी जिव्हा चलती है। तो... जाते रहो धर्मान्ध मोक्ष-लाभार्थियों, ऐसी भगदड़ का हिस्सा बन कर मोक्ष पाने के लिए। परलोक सुधरेगा या नहीं, यह तो ईश्वर ही जाने, इहलोक ज़रूर बिगड़ जाएगा। मृतात्माओं को हम सभी की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 🙏🏼!

मुक्तक

                                                                                         मुक्तक            प्रभु से मेरी आरज़ू -                                                 रोटी मिले , कपड़ा मिले , छत मिले हर एक सिर को ,                                                माथे   पर...

बेटी (कहानी)

  “अरे राधिका, तुम अभी तक अपने घर नहीं गईं?” घर की बुज़ुर्ग महिला ने बरामदे में आ कर राधिका से पूछा। राधिका इस घर में झाड़ू-पौंछा व बर्तन मांजने का काम करती थी।  “जी माँजी, बस निकल ही रही हूँ। आज बर्तन कुछ ज़्यादा थे और सिर में दर्द भी हो रहा था, सो थोड़ी देर लग गई।” -राधिका ने अपने हाथ के आखिरी बर्तन को धो कर टोकरी में रखते हुए जवाब दिया।  “अरे, तो पहले क्यों नहीं बताया। मैं तुमसे कुछ ज़रूरी बर्तन ही मंजवा लेती। बाकी के बर्तन कल मंज जाते।” “कोई बात नहीं, अब तो काम हो ही गया है। जाती हूँ अब।”- राधिका खड़े हो कर अपने कपडे ठीक करते हुए बोली। अपने काम से राधिका ने इस परिवार के लोगों में अपनी अच्छी साख बना ली थी और बदले में उसे उनसे अच्छा बर्ताव मिल रहा था। इस घर में काम करने के अलावा वह प्राइमरी के कुछ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थी। ट्यूशन पढ़ने बच्चे उसके घर आते थे और उनके आने का समय हो रहा था, अतः राधिका तेज़ क़दमों से घर की ओर चल दी। चार माह की गर्भवती राधिका असीमपुर की घनी बस्ती के एक मकान में छोटे-छोटे दो कमरों में किराये पर रहती थी। मकान-मालकिन श्यामा देवी एक धर्मप्राण, नेक महिल...