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श्राद्ध (लघुकथा)

अभिजीत तन्मय हो कर वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों को खाना खिला रहा था। परोसगारी में आश्रम का एक कर्मचारी राघव भी उसकी मदद कर रहा था। 

"हाँ जी, आ जाइये।" -दरवाज़े पर एक व्यक्ति को खड़ा देख राघव ने कहा।  

अभिजीत ने पलट कर देखा, उसका चचेरा भाई परेश आया था। 

"भाई साहब, भाभी ने मुझे बताया कि आप यहाँ हैं, जबकि मैंने पहले ही आपको सूचित कर दिया था कि आज सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध है और मेरे यहाँ ब्राह्मण-भोज होगा। आपको भी भाभी के साथ मैंने अपने यहाँ निमंत्रित किया था न! मैं आपको लेने आया हूँ।" -परेश आते ही बोला। 

"परेश, तुम उन पूर्वजों की शांति के लिए यह श्राद्ध करते हो, जिन्हें तुमने नहीं देखा, जबकि चाचा जी को वृद्धावस्था में अकेले छोड़ कर तुम अपने बीवी-बच्चों के साथ पृथक फ्लैट में रहते हो। क्या यह युक्तिसंगत है?... इन बुज़ुर्गों को देख रहे हो परेश? इनमें से कुछ लोग तो अपनी संतान के दुर्व्यवहार के कारण यहाँ हैं और कुछ को उनकी औलादों ने ही यहाँ छोड़ रखा है। ..."

परेश और राघव चुपचाप खड़े अभिजीत को सुन रहे थे। अभिजीत ने कहना जारी रखा- "इन लोगों के न रहने पर इनकी औलादें दिखावे के लिए इनका श्राद्ध करेंगी। मुझे कोई अफ़सोस नहीं कि मैं श्राद्ध नहीं करता। मैं तो इनमें ही अपने पितरों को देखता हूँ और इनको भोजन करा के मुझे ख़ुशी मिलती है।"

…और अभिजीत पुनः राघव के साथ अपने काम में व्यस्त हो गया। 

परेश सिर झुका कर दरवाज़े की तरफ लौट रहा था। 


*****

 

Comments

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 2 सितंबर 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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    1. मेरी लघुकथा को इस सुन्दर पटल पर स्थान देने के लिए आभार आ. यशोदा जी!

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  2. मेरे विचार में झगड़ों और द्वेष में साथ रहने से अलग रहना बेहतर है, लेकिन वृद्ध अकेली रहने वाली माँ को भूलने वाले को उसका कर्तव्य याद दिलाना सही है!

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