'मुझसे रूठी मेरी कविता' नैन तुम्हारे किससे उलझे, क्यों पास मेरे तुम ना आती? तुम ऐसी छलना नारी हो, डगर-डगर फिरती मदमाती। हर दिन औ' हर रात-सवेरे, नई राहों से निकल जाती। मैं तुम्हारा सन्त उपासक, तुम औरों के दर इठलाती। रातें कितनी भी गहराएँ, आँखों में नींद नहीं आती। काव्य-कविता नाम तुम्हारा,तुम रसिकों का मन बहलाती। बाट जोहती कलम हमारी, क्यों हमको इतना तरसाती? चाहे तुम कितना भी रूठो,लेकिन मुझको अब भी भाती। ...