जिजीविषा
जिजीविषा-- यह केवल जीवन की इच्छा नहीं, बल्कि उस अदम्य ज्वाला का नाम है, जो मृत्यु के साये में भी जीवन का संकल्प बनकर धधकती है। यह कहानी है दो मासूम भाई-बहन की, जो भूख, भय और अंधेरे से घिरे हैं। उनके भीतर है एक ऐसी जिजीविषा जो उन्हें टूटने नहीं देती। जब शब्द चुप हो जाते हैं, तब आँखें बोलती हैं। जब पेट की ज्वाला हड्डियों तक पहुँचती है, तब आत्मा संघर्ष का शंखनाद करती है।
सुबह के आठ बज रहे थे। कस्बे के बाहरी इलाके में रहने वाले भाई-बहन, रवि और रीना अपने घर से नाश्ता कर के बाहर खेलने निकल पड़े थे। उनकी माँ अपने कामों में व्यस्त थी। सूरज की किरणें कस्बे की गलियों में फैल रही थीं। रवि बारह वर्ष की उम्र का था और रीना आठ वर्ष की थी। रवि हमेशा छोटी बहन रीना का बहुत ख़याल रखता था। रीना शरारती थी, लेकिन अपने भाई को बहुत प्यार करती थी। वह भाई से कभी जुदा नहीं रह सकती थी।
दोनों खेलते-खेलते अपनी ही धुन में, कस्बे के बाहर एक सुनसान रास्ते पर बढ़ते चले गए। रास्ते से कुछ दूरी पर वहाँ एक पुराना गोदाम था, जो किसी व्यवसायी का था। गोदाम महीनों में खुला करता था। इसके दरवाज़े का एक पट बंद था तथा दूसरा पट थोड़ा खुला हुआ था। शायद व्यवसायी का कारिन्दा भूलवश उसे ठीक से बंद करना भूल गया था। जिज्ञासावाश रवि ने खुले हुए पट को थोड़ा बाहर की ओर खींचा और भीतर चला गया। "देख छुटकी, यहां कितनी पुरानी चीजें हैं! लगता है कोई यहाँ कबाड़ इकठ्ठा करता है।" -रवि ने अचरज से कहा। दरवाज़ा एक स्प्रिंग से जुड़ा था, जो एक बड़े कंकड़ से अटकने के कारण ठीक से बंद नहीं हो पाया था। रवि के पाँव की ठोकर के कारण कंकड़ आगे खिसक गया और दरवाज़ा बंद होने लगा। अकेले बाहर रह जाने के भय से रीना ने दरवाज़े को अपनी तरफ खींचा और वह भी भाई के पीछे भीतर चली आई। बच्चों को पता भी नहीं चला और दरवाज़े में इनबिल्ट रॉड नीचे छेद में गिरी। क्लिक की आवाज़ के साथ दरवाज़ा पूरी तरह से बंद हो गया। दोनों बच्चे चौंक गए।
"भैया, दरवाज़ा बंद हो गया!" -रीना घबरा कर बोली। रवि ने दरवाज़े को धक्का दिया, लेकिन वह नहीं खुला। उसने दरवाज़े को अच्छी तरह से चैक किया, लेकिन उसे खोल सकने की कोई सम्भावना उसे नज़र नहीं आई। अब तो रवि भी घबराया, लेकिन इस मुश्किल घड़ी में भी रीना को सांत्वना देने की कोशिश की- "डर मत छुटकी, मैं हूँ न !" गोदाम में कुछ पुरानी मशीनें और कुछ ड्रम पड़े थे। गोदाम में दरवाज़े की बारीक झिर्रियों से आती प्रकाश की किरणें भीतर के अंधेरे में नहीं के बराबर दृश्यता दे रही थीं। रवि बड़ी देर तक गोदाम में इधर-उधर घूम कर कुछ देखने-समझने की कोशिश कर रहा था। गोदाम में एक बड़ा हॉल और उसके भीतर एक और कमरा था। टूटी-फूटी हालत में मशीनों के कुछ पुर्जों के अलावा एक छोटा ड्रम था, जिसमें पानी भरा हुआ था। पास ही आधा भरा एक मग भी फर्श पर पड़ा था। एक अजूबा उन्होंने यह भी देखा कि गोदाम के बाहर लगे किसी पेड़ की टहनी कमरे की एक दीवार को भेद कर भीतर आई हुई थी। रवि को एहसास हो गया कि बाहर निकलने का कोई रास्ता या साधन नहीं है।
बाहर रास्ते से इतनी देर में मात्र एक ट्रक के गुज़रने की आवाज़ आई थी। रीना ने चिल्लाना शुरू कर दिया। पहले तो रवि कुछ समझ ही नहीं पाया कि वह रीना को क्या कहे, लेकिन फिर उसने भी चिल्लाना शुरू किया- "अरे, हमें यहाँ से निकालो कोई, कोई सुन रहा है बाहर...?" थोड़ी-थोड़ी देर में वह दोनों अलग-अलग तरीके से चीख-पुकार करते रहे, लेकिन उनकी चीखें किसी ने नहीं सुनीं। "मम्मी!...पापा!" कहते वह दोनों रोते-बिलखते चिल्लाने लगे, लेकिन नतीजा शून्य था।
घर पर, मां सरिता और पिता रामलाल चिंतित हो उठे। शाम ढली, रात हुई, लेकिन बच्चे नहीं लौटे। "कहां चले गए यह दोनों?" -सरिता रोते हुए बार-बार बोलती। रामलाल ने पड़ोसियों से पूछा, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। शाम होते-होते वे पुलिस स्टेशन पहुँचे। "सर, हमारे बच्चे गायब हैं। कृपया ढूंढिए उन्हें।" -रामलाल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। पुलिस ने रिपोर्ट लिखी, आस-पास तलाशी ली। दो दिन बीत गए। दुनिया बदस्तूर चल रही थी। सरिता दिन-रात रोती- "मेरे बच्चों, कहाँ हो तुम?" रामलाल बदहवास-सा इधर-उधर ढूंढता। उन्होंने पुलिस में शिकायत की थी, लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि बच्चे किसी ऐसे स्थान पर हो सकते हैं जो आम तौर पर कोई सोच भी न सके। खोज का दायरा सीमित था- स्कूल, पार्क, पड़ोस। इतनी दूर, उस गोदाम की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। पुलिस वालों ने तलाश बंद कर दी। "शायद कहीं भाग गए।" -उनका कहना था।
गोदाम के अंदर भी समय तो चलायमान था ही। सांझ हो जाने से अँधेरा बढ़ गया। अंधेरे में दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपटे रहे। "भैया, मुझे डर लग रहा है," -रीना कहती । रवि उसे बहलाता, "चिंता मत कर, मैं हूँ ना। जल्दी ही कोई न कोई आएगा।" प्यास लगी तो उन्होंने ड्रम में मग डाल कर पानी निकाला। दोनों ने दो-तीन घूँट पानी पीया। पानी पुराना था और कुछ बदबूदार भी, लेकिन उस समय उनके लिए मानो अमृत बन गया था। समय के साथ भूख बढ़ती गई। पहला दिन उनके लिए बहुत कठिन नहीं रहा। उन्होंने धीरज रख कर सहा। फिर दूसरा दिन आया। रवि बहन को कहानियाँ सुनाता। उसे दिलासा देता- "याद है, मम्मी की रोटी कितनी स्वादिष्ट होती है? जल्दी ही हमें खाने को मिलेगी।" रीना आँखों में आँसू लिये मुस्कुराती।
तीसरे दिन रवि ने गोदाम के भीतर आ रही टहनी पर लगी कुछ पत्तियों में से एक पत्ती तोड़ कर चबाई। पत्ती का स्वाद फीका था, लेकिन फिर भी उसने पूरी पत्ती चबा-चबा कर खा ली। उसे लगा कि इन पत्तियों को खा कर भूख मिटाई जा सकती है। उसने कुछ पत्तियाँ और तोड़ीं। कुछ पत्तियाँ उसने खाई और कुछ रीना को दी। अब तो वह रोज़ सुबह-शाम पत्तियाँ खाने लगे।
तीन दिन इसी तरह पत्तियाँ खाते गुज़र गए। टहनी पर लगी पत्तियाँ ख़त्म हो गईं। पत्तियों से भूख पूरी तरह से तो मिटती नहीं थी, लेकिन फिर भी काम चल रहा था। छठे दिन उन्हें बिल्कुल भूखों रहना पड़ा।
सातवाँ दिन हो रहा था...पेट की आग बढ़ती जा रही थी। भूख असहनीय होने लगी। वे बहुत कमज़ोर हो गए थे। अब खाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं था। उनकी चीखें अब कमज़ोर आवाज़ में बदल गई थीं। "भैया, कुछ खाने को मिल जाता।" -रीना रोते हुए बोली। रवि का दिल टूट रहा था। उसने रीना की ओर देखा, उसका मासूम चेहरा पीला पड़ने लगा था।
"भैया, क्या हम मर जाएँगे?” -रीना ने सहमी आवाज़ में पूछा।
"नहीं, हम जीएँगे और अपने घर जायेंगे।" -रवि ने रीना को चूम कर विश्वास दिलाया।
अनायास ही रवि के दिमाग़ में एक विचार कौंधा। उसने कहा- "छुटकी, अब हम अपने ही शरीर का मांस खाएँगे। उसने प्रयोग के तहत अपने हाथ के कोमल हिस्से को दाँतों से काटने की कोशिश की, लेकिन दर्द के कारण वह ऐसा नहीं कर सका। एक डॉक्टर भी ऑपरेशन करने के लिए मरीज के शरीर पर चीरा लगाता है, लेकिन स्वयं के शरीर पर चीरा नहीं लगा सकता। रीना ने उसकी इस हरकत को देखा, तो उसे रोका- "नहीं भैया।"
रवि ने कहा- "छुटकी, मैं खुद को नहीं काट सकता। तू मेरे हाथ में दांत गड़ा कर थोड़ा टुकड़ा खा ले।"
"नहीं भैया, ऐसा मत बोलो।" -रीना रोते हुए बोली।
"मैंने कहा छुटकी, मेरे हाथ पर काट।" -रवि चिल्लाया।
"नहीं। मैंने कभी मांस नहीं खाया। अब कैसे खा सकती हूँ और वह भी आपका!"
"काट फ़ौरन।" -रवि ने उसे थप्पड़ मार कर गुर्राते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
रीना ने भाई का ऐसा गुस्सा कभी नहीं देखा था। घबरा कर उसने रवि की बाँह पर दांत गड़ाए। खून निकलता देख उबकाई आने से उसने अपना मुँह वापस खींच लिया।
"छुटकी, देख! तेरा ख़याल रखना मेरा फ़र्ज़ है। मैं बड़ा हूँ, तेरा भाई हूँ। मेरा कहना मान और थोड़ा सा मेरे हाथ पर काट कर खा ले। देख, मुझमें तुझसे अधिक ताकत है।" -रवि ने समझाया।
"नहीं कर सकती भैया, मैं नहीं कर सकती।"
"जी कड़ा कर और एक बार फिर से कोशिश कर।"
रीना ने करुण दृष्टि से रवि की ओर देखा और इस बार फिर से उसके हाथ पर दांत गड़ाए।
"शाबाश छुटकी, ज़ोर से दांत दबा कर खींच और काट ले टुकड़ा।" -रवि ने उसे उत्साहित किया।
और आखिर, मांस का एक टुकड़ा रीना के मुँह में आ गया।
"हाँ, अब अच्छे से चबा कर खा जा... शाबाश!" -कराहते हुए रवि ने कहा, लेकिन मुँह से आह नहीं निकलने दी।
"भूख इन्सान को बहशी बना देती है। जब इंसान, विशेष रूप से बच्चे, भुखमरी की चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं, तो उनके कार्य तर्कसंगत नहीं रह जाते। तीव्र भूख से प्रेरित होकर, शरीर जीने की वृत्ति को प्राथमिकता देता है, और इस दौरान किसी भी जीवित प्राणी को काटने, खाने की आक्रामकता मनोवैज्ञानिक रूप से सम्भव हो जाती है। एक टुकड़ा खा लेने के बाद रीना के मन से हींक निकल गई। रवि के द्वारा फिर आग्रह करने पर उसने उसके हाथ से एक टुकड़ा और काट कर खा लिया। उसे भूख से कुछ राहत मिली। उसने कृतज्ञ दृष्टि से भेया की ओर देखा और फिर उसके हाथ से खून बहता देख अपनी फ्रॉक से कपड़े का टुकड़ा फाड़ कर घाव वाले स्थान पर बाँध दिया। उसने अपनी माँ को ज़ख्म पर इस तरह कपड़ा बांधते देखा था।
कराह रहे रवि को कुछ आराम मिला। थोड़ी देर बाद खून बहना भी बंद हो गया।
"भैया, अब मेरे हाथ से काट कर आप भी खा लो।" -रीना आतुर स्वर में बोली।
"नहीं पगली! मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? मैं बड़ा हूँ, भूखा रह सकता हूँ। और फिर तू मेरी प्यारी बहन है ना !" -रवि ने अपने दूसरे हाथ से रीना के सिर को सहलाया।
कई दिनों से बच्चे आधी-अधूरी नींद सो रहे थे। आज रीना की आँखे दिन में ही बोझिल हो आईं और वह भाई की गोद में सिर रख कर सो गई। गोदाम में अँधेरा गहरा रहा था, जिससे लग रहा था कि रात हो रही है। वैसे भी वहाँ रौशनी का कोई स्रोत नहीं होने से लगभग अँधेरा ही रहता था और दिन व रात में अधिक अंतर नहीं था।
अगले दिन सुबह, संयोग से एक आवारा कुत्ता एक बिल्ली का पीछा करते हुए उस सुनसान रास्ते से होता गोदाम की तरफ आया। बिल्ली पास में ही एक पेड़ पर चढ़ गई। सहसा कुत्ता गोदाम के पास रुक गया। गोदाम के दरवाज़े को उसने सूंघा और जोर-जोर से भौंकने लगा। उसकी 'भौं-भौं' की आवाज़ सुनसान में गूंज उठी।
"बाहर कोई कुत्ता भौंक रहा है।" -जाग गई रीना ने कमज़ोर आवाज़ में कहा। वह डरी नहीं, यह तो जैसे जीवन की पुष्टि थी। रवि की तरफ से कोई जवाब न पा कर रीना ने दो बार और पुकारा उसे और फिर घबरा कर रोने लगी।
कुछ देर भौंकने के बाद, कुत्ता बस्ती की तरफ भागा। बस्ती में पहुँचा, बार-बार भौंका और घूम कर गोदाम की दिशा में दौड़ा। वापस आया, फिर भौंका और उसी दिशा में फिर दौड़ा। उसकी यह हरकत बस्ती के दो युवकों, विजय और आकाश ने देखी। "यह कुत्ता शायद कुछ बताना चाहता है।" -विजय ने कहा।
"चलो, देखते हैं।" -आकाश ने प्रतिक्रिया में कहा।
कुत्ता उन्हें गोदाम तक ले आया। वहाँ रुक कर भौंकता रहा। युवकों को अजीब-सा लगा। गोदाम बंद था। वह लोग कुछ पास में गये। एक गंध-सी महसूस की उन्होंने... वे समझ गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने पुलिस को फोन पर लोकेशन भेज कर कहा- "सर, यहाँ एक गोदाम है, कुत्ता बार-बार भौंक रहा है। कुछ तो गड़बड़ है।"
थानेदार ने दो सिपाहियों को मौके पर भेजा। कुत्ता अब भी भौंके जा रहा था। गोदाम के भीतर से आती बदबू को महसूस कर सिपाहियों ने गोदाम के मालिक को बुलाया। गोदाम मालिक हैरान था- "यह गोदाम तो हम कभी-कभार ही खोलते हैं। अभी कुछ दिन पहले हमारे एक कामगार ने इसे खोला था।" उसने दरवाज़े के की होल में चाबी घुमा कर दरवाज़ा खोला। अंदर का दृश्य दिल दहला देने वाला था। पुलिस और अन्य लोग भीतर आये- वहाँ ठंडक थी और दीवारों पर सीलन थी। उन्होंने देखा, वहाँ दो छोटे-छोटे शरीर एक कोने में सिमटे पड़े थे। एक लड़का और एक लड़की- घायल और कमज़ोर, लेकिन जीवित। लड़का बेहोश था। भूख ने उन दोनों की आँखों की चमक चुरा ली थी, लेकिन उनमें अब भी एक हल्की सी चिंगारी थी- जीने की।
पुलिस ने उन्हें बाहर निकाला। अस्पताल पहुँचाया। सरिता और रामलाल को खबर दी गई। वे भागे-भागे आए। डॉक्टरों ने इलाज के लिए बच्चों को टेबल पर ले रखा था। "मेरे बच्चे!" -सरिता चीखकर बेहोश हो गई। रामलाल ने रोते हुए दोनों बच्चों के सिर को सहलाया। रीना के मुँह के आस-पास लगे खून के धब्बों और रवि के हाथों पर दिखाई दे रहे ज़ख्मों को देख कर उन्होंने सच का अनुमान लगाया। उपस्थित अन्य लोगों ने भी यह सब देखा। घाव गहरे थे, लेकिन बच्चे की जीवटता उनसे भी गहरी थी। एक डॉक्टर ने कहा- “यह चमत्कार है कि बच्चे ज़िंदा हैं। ज़िंदगी कभी-कभी सिर्फ़ साँसों से नहीं, इरादों से बचती है।”
रवि और रीना समय के साथ स्वस्थ होते चले गए। जीवन और मृत्यु के बीच के उस अनुभव ने उनके प्यार को और अधिक गहराई दे दी थी।
रीना रवि से कहती- "तू मेरा प्यारा भाई है, मेरा रक्षक!"
"और तू मेरी भक्षक।" -रवि उसे छेड़ने के अंदाज़ में मुस्कुराते हुए जवाब देता।
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