एक खामोशी
(लघुकथा)
सड़क शांत थी। पेड़ों की छाया लंबी होकर दोनों बच्चों के करीब उतर आई थी। एक बच्चा नंगे पाँव, मैले कपड़ों में लकड़ी के एक डिब्बे पर बैठा था। दूसरा, साफ़, उजले कपड़ों में उसके सामने एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा था।
पॉलिश की गंध हवा में घुल रही थी। लड़के के हाथ छोटे थे, पर गति में बिजली थी। ब्रश जूते पर ही नहीं, उसके खयालों में भी चलता जा रहा था।
“तुम स्कूल जाते हो?”
-खड़े लड़के ने अचानक पूछा।
बैठे लड़के का हाथ क्षण भर के लिए रुका -
“पहले जाता था।”
“अब क्यों नहीं?”
कुछ पल चुप्पी रही। बह रही हवा ने पेड़ों के पत्तों को छुआ और टकराकर लौट गई।
खड़े लड़के ने दूसरा जूता आगे बढ़ा दिया।
काम पूरा हुआ और खड़े लड़के ने जेब से पैसे निकाले। बैठे लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया।
एक क्षण के लिए हाथों का स्पर्श… फिर, एक खामोशी !
पर हाँ, उस एक स्पर्श ने संवाद पूरा कर दिया। खड़ा लड़का उसके स्कूल चला गया। दूसरा लड़का वहीं बैठा रहा।
पेड़ वहीं रहे, सड़क वहीं रही, बस बैठे लड़के की निगाह सड़क के इस ओर से उस ओर घूमती रही।
*****
कविता
फासला
एक सड़क,
दो बच्चे,
उम्र-
दोनों की बराबर।
एक के हाथ में ब्रश,
दूसरे के पैरों में जूते,
बीच में
चुप्पी का एक फासला !
पेड़ गवाही दे रहे हैं
कि धूप किसी का भेद नहीं जानती,
पर छाया
हमेशा किसी एक के हिस्से ज़्यादा आती है।
एक झुका है,
दूसरा खड़ा—
पर आँखें
दोनों की एक मकसद लिये हैं।
जूते चमकते हैं,
हाथ काले हो जाते हैं,
और एक बचपन
चुपचाप
फुटपाथ पर बैठा रह जाता है।
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