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विषय एक - रचनाएँ दो (लघुकथा और कविता )

  लघुकथा  एक खामोशी सड़क शांत थी। पेड़ों की छाया लंबी होकर दोनों बच्चों के करीब उतर आई थी। एक बच्चा- नंगे पाँव, मैले कपड़ों में लकड़ी के एक डिब्बे पर बैठा था। दूसरा- साफ़ कपड़ों में उसके सामने एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा था। पॉलिश की गंध हवा में घुल रही थी। लड़के के हाथ छोटे थे, पर गति में बिजली थी। ब्रश जूते पर नहीं, जैसे उसके खयालों में उतरता जा रहा हो। “तुम स्कूल जाते हो?” -खड़े लड़के ने अचानक पूछा। बैठे लड़के ने सिर हिलाया- “पहले जाता था।” कुछ पल चुप्पी रही। फिर खड़े लड़के ने दूसरा जूता आगे बढ़ा दिया। काम पूरा हुआ। खड़े लड़के ने पैसे बढ़ाए, बैठे लड़के ने हाथ बढ़ाया - उसी क्षण दोनों की उँगलियाँ छू गईं। फिर, एक खामोशी ! सड़क वही रही, पेड़ वही रहे, पर उस एक स्पर्श में दोनों अपनी कहानी कह गए।  ***** कविता    फासला   एक सड़क, दो बच्चे, और उम्र- दोनों की बराबर। एक के हाथ में ब्रश, दूसरे के पैरों में जूते, बीच में चुप्पी का एक फासला ! पेड़ गवाही दे रहे हैं कि धूप किसी का भेद नहीं जानती, पर छाया हमेशा किसी एक के हिस्से ज़्यादा आती है। एक झुका है, दूसरा खड़...

बेटी (कहानी)

  “अरे राधिका, तुम अभी तक अपने घर नहीं गईं?” घर की बुज़ुर्ग महिला ने बरामदे में आ कर राधिका से पूछा। राधिका इस घर में झाड़ू-पौंछा व बर्तन मांजने का काम करती थी।  “जी माँजी, बस निकल ही रही हूँ। आज बर्तन कुछ ज़्यादा थे और सिर में दर्द भी हो रहा था, सो थोड़ी देर लग गई।” -राधिका ने अपने हाथ के आखिरी बर्तन को धो कर टोकरी में रखते हुए जवाब दिया।  “अरे, तो पहले क्यों नहीं बताया। मैं तुमसे कुछ ज़रूरी बर्तन ही मंजवा लेती। बाकी के बर्तन कल मंज जाते।” “कोई बात नहीं, अब तो काम हो ही गया है। जाती हूँ अब।”- राधिका खड़े हो कर अपने कपडे ठीक करते हुए बोली। अपने काम से राधिका ने इस परिवार के लोगों में अपनी अच्छी साख बना ली थी और बदले में उसे उनसे अच्छा बर्ताव मिल रहा था। इस घर में काम करने के अलावा वह प्राइमरी के कुछ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थी। ट्यूशन पढ़ने बच्चे उसके घर आते थे और उनके आने का समय हो रहा था, अतः राधिका तेज़ क़दमों से घर की ओर चल दी। चार माह की गर्भवती राधिका असीमपुर की घनी बस्ती के एक मकान में छोटे-छोटे दो कमरों में किराये पर रहती थी। मकान-मालकिन श्यामा देवी एक धर्मप्राण, नेक महिल...