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अधूरी चिट्ठियाँ (कहानी)





अधूरी चिट्ठियाँ


मारवाड़ और शेखावाटी की सीमा के पास स्थित गाँव कांटी में रहता था रामजी। गाँव की चौपाल से कुछ दूरी पर एक बरगद का पेड़ था। उस पेड़ के पास ही दो कमरों और केलू की छत वाले घर में रहने वाला रामजी, चार दर्जे तक पढ़ा, एक साधारण किसान था, जिसके हाथों में खेतों की मिट्टी की खुशबू थी और दिल में एक अबूझ खलिश। गाँव की सरहद पर खड़ा वह पुराना बरगद का पेड़ सदियों से चुपचाप समय का गवाह बना हुआ था। उसकी जड़ें मिट्टी में गहरी पैठी हुईं थीं, वैसे ही जैसे रामजी की जिंदगी गाँव की मिट्टी से जुड़ी हुई थी। उसकी उम्र अब सित्तर के पार थी, लेकिन आँखों में अभी भी वह चमक थी जो बेटी राधा के बचपन की यादों से जुड़ी थी। हर शाम, जब अपने खेत से लौटता, जब सूरज की लालिमा आसमान को छूती, रामजी बरगद के नीचे बैठता। उसके हाथ में एक फटी-पुरानी डायरी होती, और कलम जो अब उसकी कांपती उंगलियों में लड़खड़ाती थी। वह लिखता, लेकिन कभी पूरा नहीं लिख पाता, हर चिट्ठी अधूरी रह जाती।

रामजी की जिंदगी बहुत तकलीफ़ वाली रही थी। जवानी में उसने अपनी पत्नी, लक्ष्मी को खो दिया था। लक्ष्मी की मौत ने उसे तोड़ दिया था, लेकिन राधा, उनकी इकलौती बेटी, ने उसे फिर से जीना सिखाया। राधा बचपन में रामजी की परछाई थी। वह उसके साथ खेतों में जाती, बछड़ों से खेलती, और शाम को स्कूल से आने के बाद बरगद के नीचे बैठकर अपने बाबा से कहानियाँ सुनती। राधा थोड़ी बड़ी हुई, तो बाबा के शिथिल शरीर और कांपते हाथों को थोड़ा सहारा देने के लिए खाना बनाने और अन्य कामों में मदद भी करने लगी थी।

उसी बरगद के नीचे चारपाई पर अपने बाबा के साथ बैठी राधा ने एक दिन कहा- "बाबा, जब मैं बड़ी होऊँगी, तो आपको शहर ले जाऊँगी। वहाँ बड़े-बड़े घर होते हैं और साफ़-सुथरी सड़कों पर चमचमाती गाड़ियाँ दौड़ती हैं। अपने यहाँ कितनी धूल उड़ती है!"

"तन्नै कियाँ पतो लाग्यो, राधा?"

"हमारे स्कूल में शहर से बदली होकर एक टीचर आई है, वही बताती है।" -राधा की आँखों में चमक थी। स्कूल की उसकी तीनों अध्यापिकाएँ बच्चों को हिन्दी में पढ़ाई कराती थीं, अतः राधा भी सामान्यतः हिन्दी में ही बात किया करती थी।

रामजी ने हँसकर कहा- "बेटा, मन्नै तो अठै री माटी घणी चोखी लागै, पण तू जठै बी जावैगी, मैं घणो राजी होऊँगो।"

“बाबा, आप हिन्दी क्यों नहीं बोलते? मुझसे हिन्दी में बात किया करो न!”

"ना बेटी, तू ई बोलती रे हिन्दी! मन्नै तो म्हारी भासा ई चोखी लागै है। इणस्यूं आपणोपणो लागै है।" -रामजी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया।

राधा की आठवीं तक की पढ़ाई पूरी हुई। रामजी चाहता था कि राधा खूब पढ़े। उसने सुना था कि कांटी के निकटतम शहर रायगढ़ में हायर सेकन्डरी स्कूल भी है और कॉलेज भी। उसे रायगढ़ में अपने एक नज़दीकी रिश्तेदार का ध्यान आया, जिससे उसकी मुलाकात भले ही बरसों में होती थी, किन्तु था वह भला आदमी। रामजी ने सोचा, ‘छोरी पढ़-लिख लेसी तो असल में 'माणस' बण ज्यासी, वाकी जिंदगी सुधर ज्यासी। म्हारो कांई है? आज हूँ ने काल नी।‘ यही विचारते उसने एक दिन राधा से कहा- “"राधा बेटी, म्हूँ तो चाहूँ कि अबे तू सहर जा’र पढ़ाई कर। अच्छी पढ़-लिख जासी तो हाकम बण जासी। थारो कांई कैणो है?"

राधा की आँखों में भी सपने थे- पढ़ाई के, नौकरी के, एक बेहतर ज़िन्दगी के। उसने उल्लसित होकर कहा था- “हाँ बाबा, ज़रूर जाऊँगी। मैं वहाँ पढ़ कर अच्छी नौकरी करूँगी और आपको भी वहाँ ले जाऊँगी।“

और वह दिन आ गया, जब राधा को शहर जाना था।

“जा रही हूँ बाबा, अपना ख्याल रखना। समय से खाना-पीना, गाँव वालों से मिलते-जुलते रहना।“ -राधा की आँखें भर आई थीं।

"म्हारी फिकर मत कर बेटी, जा, पढ़-लिख ले। बस, जद भी फुर्सत मिळै, चिठ्ठी लिखती रहज्यै।" -रामजी ने अपनी आँखों में आँसू नहीं आने दिये।

रामजी ने राधा को पढ़ने के लिए गाँव से रायगढ़ जाने वाले एक विश्वसनीय व्यक्ति के साथ अपने रिश्तेदार के पास रायगढ़ भेज दिया। उसने अपने पास अब तक की जमा पूँजी का एक बड़ा हिस्सा भी राधा की पढ़ाई और अन्य खर्चों के लिए उसके साथ भेजा।

शहर जाने के बाद राधा की चिट्ठियाँ नियमित रूप से आतीं। रामजी हर चिट्ठी को बार-बार पढ़ता, उसे लगता, जैसे राधा उसके सामने बैठी हो। वह उसकी चिट्ठी का इंतज़ार करता, और जब चिट्ठी आती, तो गाँव वालों को सुनाता और कहता- ‘"देखौ, म्हारी राधा कितणो चोखो लिखै है? ऊंची किलास में पढ़े है नै!”

'बाबा, शहर बहुत बड़ा है। यहाँ कई दोस्त बने हैं। आज पहली बार ट्रेन में बैठी, तो आपकी बहुत याद आई।' -राधा ने एक दिन लिखा।

रायगढ़ के स्कूल की चार साल की पढ़ाई के दौरान वह सात-आठ बार बाबा से मिलने गाँव आती रही थी। उसने रामजी से कहा- ‘बाबा, आप भी कभी आओ न शहर में मुझसे मिलने।‘, लेकिन रामजी को शहर जाने का मन नहीं होता था। वह कहता- "बेटी, मैं कदैई सै'र गयो कोनी, अब ईं उमर में बठै आ'र कांई करूँगो? तू आ ई ज्यावै है... अर कदैई नी भी आ सके, तो चिठ्ठी बरोबर लिखती रहज्यै। मैं ओई समझूँगा के म्हारी राधा म्हारै कनै ई है।"

राधा ने कॉलेज में दाखिल ले लिया। कॉलेज में पढ़ते राधा खुश थी। दो माह बाद वह बाबा से मिलने कांटी आई। उसने बाबा को आश्वस्त किया कि वह वहाँ अच्छे-से है और पढ़ाई भी अच्छी चल रही है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान शुरू-शुरू में तो उसकी चिट्ठियाँ रामजी के पास आती रहीं, लेकिन समय के साथ, चिट्ठियाँ कम होने लगीं। शहर की भागदौड़ में राधा खो गई। पढ़ाई के बाद वहीं नौकरी मिली, दोस्त बने, और गाँव की यादें धुंधली पड़ने लगीं। अब, बस त्यौहारों पर एक छोटा-सा पत्र आता, 'बाबा, यहाँ सब ठीक है। टाइम बिल्कुल नहीं मिलता। जल्दी आऊँगी।' रामजी को उससे कभी कोई शिकायत नहीं रही। वह जानता था कि राधा की दुनिया अब अलग है, वह व्यस्त भी रहती होगी, लेकिन उसके दिल में एक खालीपन बढ़ता जा रहा था।

हर शाम, बरगद के नीचे, रामजी अपनी डायरी खोलता। 'लाडली बेटी राधा,' से शुरू करता। वह लिखता, ‘ईं बार खेतां में धान री फसल घणी चोखी हुई है। थन्नै याद है के, तू बचपण में धान की पौध लारै छिप ज्याती ही?’ या कुछ और, लेकिन हर बार, कुछ शब्दों के बाद उसकी आँखें नम हो जातीं। मन ही मन कहता, ‘राधा नै कांई म्हारी बातां समझ में आवैगी? आज भी कांई वा म्हारी वोई राधा है?" डायरी बंद हो जाती, और चिट्ठी अधूरी रह जाती। पड़ोसी माधव जी, पूछते- ‘रामजी भाई, थें रोज ई संझा डायरी में कांई लिखो हो? अठै डाक आळी बस निकलै जणा कंडक्टर साब नै क्यूँ नी देवो?’ रामजी मुस्कुराकर जवाब देता- ‘चिठ्ठियां अधूरी है रे। भेजण स्यूं पैल्यां पूरी तो कर ल्यूं।’ लेकिन सच्चाई यह थी कि उसे डर था, अगर चिट्ठी भेजी और जवाब नहीं आया, तो उसका दिल और टूट जाएगा। वह राधा को आधी-अधूरी चिट्ठी अपनी डायरी में ही लिखता और राधा की अब तक आई चिट्ठियों को बार-बार पढ़ कर संतोष कर लेता।

एक दिन उसने हिम्मत कर के पहली बार दो-तीन लाइन लिख कर चिट्ठी राधा के घर के पते पर भेजी, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। हाँ, करीब एक पखवाड़े के बाद राधा का एक पत्र ज़रूर आया, किन्तु उसमें रामजी का पत्र मिलने का कोई हवाला नहीं था। रामजी ने अनुमान लगाया कि या तो राधा ने घर बदल लिया है और उसे चिट्ठी नहीं मिली है या फिर वह उसकी चिट्ठी के बारे में लिखना भूल गई है। रामजी उद्वेलित हो उठा। अपनी पीड़ा भुलाने के लिए वह माधव जी के घर जाने को हुआ, तो उन्हें बरगद के नीचे बैठ चिलम पीते हुए पाया। कुछ देर उन दोनों के बीच इधर-उधर की बातें हुई ही थीं कि अनायास ही रामजी की आँखें छलछला आईं- “माधो जी, छोरी री याद घणी आवे है... वणा बिना मन ई कोनी लागे। अबे तो ओ घर काट खावा ने दौड़ै है।"

"धीरज राखो रामजी, नौकरी स़ु छुट्टी मिलत ई वा बेगी ई आ ज्यासी। नीं तो, आपण दोई जणा वठैई वणा सु मिलवा चाल्या जास्यां।" -माधव जी ने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर सांत्वना देते हुए कहा। कुछ समय माधव जी के साथ और गुज़ारने के बाद कुछ राहत की साँस के साथ रामजी घर लौट आया।

गाँव की सरहद पर एक पुराना सा टीन का छप्पर, जिसके नीचे एक बँच गाँव वालों ने अपनी सुविधा के लिए रखी हुई है, गाँव का बस स्टैन्ड है। गाँव आने-जाने वाली बस यहीं रुकती है।

एक दिन बस का इंतज़ार कर रहे एक ग्रामीण ने बस स्टैन्ड की बँच पर रामजी को बड़ी देर तक बैठे देखा, तो पूछा- "रामजी भाई, आज तो अठै घणी देर स्यूं बैठा हो? कांई आज राधा आवण आळी है?"

"ना भाई, राधा तो कोनी आवै, पण आज मन कहवै है के उणरी कोई चिठ्ठी जरूर आवैगी।"

तभी बस आ गई और तीन यात्री बस से उतरे। कन्डक्टर ने हाथ के इशारे से रामजी को बताया कि कोई चिट्ठी नहीं आई है। प्रतीक्षारत ग्रामीण रामजी को दिलासा देते हुए बस में बैठ गया। बस के जाने के बाद बस स्टैन्ड पर सन्नाटा पसर गया। रामजी की डबडबा आई आँखें सड़क पर उड़ रही धूल में राधा की चिट्ठी की इबारत ढूँढ़ रही थीं।

सांझ हो रही थी। गाँव के लोग चौपाल पर इकट्ठा हो हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। मायूस रामजी को बस स्टैन्ड के रास्ते से लौटते और घर को जाते देख माधव जी ने चिलम की राख झाड़ते हुए कहा- "रामजी री काया अब जवाब दे री है, पण आँखियां अजैई बी बस आळी सड़क पै ठहरी है। उणनै राधा री चिट्ठी आवण री आस बणी हुई है।"

एक दिन, गाँव में भारी बारिश हुई। रामजी खेतों में काम कर रहा था, उसे याद आया कि राधा को बारिश बहुत पसंद थी। राधा को याद करते, उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा और बारिश में भीगता रहा। घर लौटा तो डायरी निकाली, लिखा- ‘राधा, आज मेह में भीज्यो। तू अठै होती तो घणी नाचती। थारे बिना अब तो ओ मेहो भी उदास लागे है।’ उस रात, वह बीमार पड़ गया। बुखार चढ़ा, साँसें भारी हो गईं। अगले दिन दोपहर माधव जी रामजी को बाहर नहीं निकला देख, सुध लेने आये। उन्होंने गाँव के कम्पाउण्डर से दवा लाकर उसे पिलाई। रामजी को अच्छी तरह से रजाई ओढ़ा कर बोला- " रामजी भाई, काले फेर आऊँगा, आपणी संभाल राखज्ये।"

“हाँ भाई, हाल कोनी मरूँ। राधा स्यूं मिलण री आस है।" -रामजी के चेहरे पर फ़ीकी मुस्कुराहट थी।

माधव जी के जाने के बाद दवा के प्रभाव से रामजी अच्छी नींद सो गया। अगला दिन हुआ... फिर अगला दिन हुआ, पर रामजी की हालत सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ गई। माधव जी परेशान और चिंतित हो उठा। रामजी को बताए बिना ही उसने रामजी के रायगढ़ वाले रिश्तेदार मनोहर जी के पते पर राधा को टेलीग्राम भेजा, 'तुम्हारे बाबा बहुत बीमार हैं। जल्दी आओ।'

शहर में, राधा अपनी व्यस्त जिंदगी में डूबी थी। वह एक कंपनी में काम करती थी, जहाँ दिन-रात मीटिंग्स और डेडलाइन्स का बोझ था। उसके दोस्त कहते, 'राधा, तू बहुत आगे जाएगी।‘ उसकी आँखों में चमक आ जाती, 'बाबा मेरी उन्नति देख बहुत खुश होंगे।' उसे गाँव की यादें कभी-कभी आतीं- बाबा की मुस्कान, बरगद की छांव, खेतों की खुशबू , लेकिन वह सोचती, 'अभी तो करियर बनाना है। बाद में जाऊँगी।' टेलीग्राम मिलते ही उसका दिल धड़क उठा। अब वह रुक न सकी, अगले ही दिन उसने बस पकड़ी और गाँव की ओर रवाना हुई। रास्ते में, वह पुरानी यादों में खो गई। बस की खिड़की से बाहर देखते हुए वह बीच में आने वाले छोटे-छोटे गाँवों, खलिहानों की नैसर्गिक महक को आत्मसात कर रही थी। उसने महसूस किया कि शहर की चमक ने उसे अंधा कर दिया था।

राधा जब घर पहुँची, तो रामजी बिस्तर पर था। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, लेकिन राधा को देख कर उसकी आँखों में चमक आ गई।

"बाबा!" -राधा बिलख पड़ी और उसके पास बैठ गई। रामजी ने कमज़ोर आवाज़ में कहा- "राधा, तू आगी!"

नम आँखों से राधा ने बाबा की ओर देखा और उसके सिर पर हाथ रखा। उसका शरीर तप रहा था।

“बाबा, मैं दवा ले कर आती हूँ, आपको बहुत तेज़ बुखार है।“

“ना बेटा, माधव जी थोड़ी देर पैल्यां ई दवाई दे'र गया है। वे म्हारो घणो खयाल राखै है। राधा बेटी... घणो बोल्यो नी जावे, बस एक घूँट पाणी पाय दे म्हने।"

राधा ने उठ कर बाबा का सिर थोड़ा ऊँचा उठा कर पानी पिलाया और फिर देर तक उसका सिर सहलाती रही। तभी राधा की नज़र रामजी की डायरी पर गई, जो बिस्तर के पास ही पड़ी थी। उसे खोला- हर पन्ना अधूरी चिट्ठियों से भरा था। एक पन्ने पर लिखा था, ’राधा, थारी मां रे जावण पछे तू ही म्हारी दुनिया ही। मैं थन्नै कदेई नी कह्यो, पण थारे बिना ओ घर मकबरो लागे है।’ दूसरे पर, ‘आज गांव में ओछब* हो। सगळा घणा राजी हा, पण मैं एकलो हो। तू अठै होती तो...।’ तो एक पन्ने पर ‘'गाँव में मेळो लाग्यो है। थारै ताईं लाल चूँदड़ी मोल ल्यायो हूँ। जद आवै, जद पैर लीज्यै।'

राधा की आँखों से आंसू बहने लगे। उसे अफ़सोस हुआ कि उसने बाबा की भावनाओं को कभी नहीं समझा। शहर की आपाधापी में वह भूल गई थी कि प्यार की कोई डेडलाइन नहीं होती।

वह अपनी जगह से उठी। ढूँढ़ कर ताक में रखी लाल चुनरी को उठाया और भीतर जाकर पहन कर आई।

"बाबा!" -उसने रामजी के पास बैठ कर करुण स्वर में पुकारा।

रामजी ने जब राधा को चुनरी में देखा, तो उसकी बोझिल और थकी आँखों में तृप्ति की एक लकीर-सी खिंच आई। उसकी बरसों की थकान इस पल के संतोष में बदल गई थी। उसने राधा का हाथ थामा- "बेटी, मन्नै थारै स्यूं कदैई कोई सिकायत कोनी ही। तू राजी रैवै, बस…ओईज… चाहतो हो।" रामजी कठिनाई से बोल पा रहा था।

राधा रोते हुए बोली- "बाबा, मुझे मेरी लापरवाही के लिए माफ कर दो। मैंने कई दिनों से आपको पत्र नहीं लिखा। आपकी चिट्ठियाँ...।"

रामजी ने ठंडी साँस ली। राधा ने सुना, बाबा मन ही मन बुदबुदा रहा था, ‘चिट्ठियां अधूरी रै गी, म्हारी ...।‘

... उस रात नियति ने रामजी की साँसों की डोर खींच ली। शायद उसकी आत्मा राधा से मिलने का ही इन्तज़ार कर रही थी।

रामजी चले गये... पीछे छोड़ गये- राधा के कंधों पर हाकिम (कलेक्टर) बनने का एक भारी सपना और पूरे गाँव के दिलों में कभी खत्म न होने वाला एक सन्नाटा।

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