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तुम आओ तो... (कविता)

      हृदय में कुछ भाव उमड़े, भावों ने श्रृंगार रस में डूबे शब्दों का रूप लिया और अन्ततः इस कविता ने जन्म लिया। प्रस्तुत कर रहा हूँ अपने रस-मर्मज्ञ, स्नेही पाठकों के लिए... 


                  


"तुम आओ तो..."


ठुकरा दे गर कोई अपना, तुम किञ्चित ना घबराना,
पथ भूल न जाना मेरा तुम, मेरे पास चली आना,
बस जाना मेरी आँखों में,
पलकों की सेज बिछा दूँगा, तुम आओ तो!

दुनिया रोके मेरी राहें, चाहे उल्टी घड़ियाँ हों,
जंजीर पड़ी हो पाँवों में, हाथों में हथकड़ियाँ हों,
सारे बंधन तोड़ूँगा  मैं,
बाधा हर एक मिटा दूँगा, तुम आओ तो!

प्यासी हो धरती कितनी भी, छाती उसकी तपती हो,
आसमान से शोले बन कर, चाहे आग बरसती हो,
मौसम हो पतझड़ का तो भी,
मैं दिल को चमन बना दूँगा, तुम आओ तो!

वसन कभी जो काटें तन को, हृदय कभी जो घबराये,
आभूषण भी बोझ लगें जब, मन उनसे भी कतराए,
मैं सूरज, चांद, सितारों से,
तुम्हारे अंग सजा दूँगा, तुम आओ तो!

जब तन में, मन में हो भटकन, सखियों से मन ना बहले,
जब डगमग पाँव लगें होने, यौवन तुमसे न सम्हले,
तुम्हारे अधरों की मदिरा,
मैं अपने होठ लगा लूँगा, तुम आओ तो!

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