Skip to main content

तुम आओ तो... (कविता)

      हृदय में कुछ भाव उमड़े, भावों ने श्रृंगार रस में डूबे शब्दों का रूप लिया और अन्ततः इस कविता ने जन्म लिया। प्रस्तुत कर रहा हूँ अपने रस-मर्मज्ञ, स्नेही पाठकों के लिए... 


                  


"तुम आओ तो..."


ठुकरा दे गर कोई अपना, तुम किञ्चित ना घबराना,
पथ भूल न जाना मेरा तुम, मेरे पास चली आना,
बस जाना मेरी आँखों में,
पलकों की सेज बिछा दूँगा, तुम आओ तो!

दुनिया रोके मेरी राहें, चाहे उल्टी घड़ियाँ हों,
जंजीर पड़ी हो पाँवों में, हाथों में हथकड़ियाँ हों,
सारे बंधन तोड़ूँगा  मैं,
बाधा हर एक मिटा दूँगा, तुम आओ तो!

प्यासी हो धरती कितनी भी, छाती उसकी तपती हो,
आसमान से शोले बन कर, चाहे आग बरसती हो,
मौसम हो पतझड़ का तो भी,
मैं दिल को चमन बना दूँगा, तुम आओ तो!

वसन कभी जो काटें तन को, हृदय कभी जो घबराये,
आभूषण भी बोझ लगें जब, मन उनसे भी कतराए,
मैं सूरज, चांद, सितारों से,
तुम्हारे अंग सजा दूँगा, तुम आओ तो!

जब तन में, मन में हो भटकन, सखियों से मन ना बहले,
जब डगमग पाँव लगें होने, यौवन तुमसे न सम्हले,
तुम्हारे अधरों की मदिरा,
मैं अपने होठ लगा लूँगा, तुम आओ तो!

                   *******

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

श्राद्ध (लघुकथा)

अभिजीत तन्मय हो कर वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों को खाना खिला रहा था। परोसगारी में आश्रम का एक कर्मचारी राघव भी उसकी मदद कर रहा था।  "हाँ जी, आ जाइये।" -दरवाज़े पर एक व्यक्ति को खड़ा देख राघव ने कहा।   अभिजीत ने पलट कर देखा, उसका चचेरा भाई परेश आया था।  "भाई साहब, भाभी ने मुझे बताया कि आप यहाँ हैं, जबकि मैंने पहले ही आपको सूचित कर दिया था कि आज सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध है और मेरे यहाँ ब्राह्मण-भोज होगा। आपको भी भाभी के साथ मैंने अपने यहाँ निमंत्रित किया था न! मैं आपको लेने आया हूँ।" -परेश आते ही बोला।  "परेश, तुम उन पूर्वजों की शांति के लिए यह श्राद्ध करते हो, जिन्हें तुमने नहीं देखा, जबकि चाचा जी को वृद्धावस्था में अकेले छोड़ कर तुम अपने बीवी-बच्चों के साथ पृथक फ्लैट में रहते हो। क्या यह युक्तिसंगत है?... इन बुज़ुर्गों को देख रहे हो परेश? इनमें से कुछ लोग तो अपनी संतान के दुर्व्यवहार के कारण यहाँ हैं और कुछ को उनकी औलादों ने ही यहाँ छोड़ रखा है। ..." परेश और राघव चुपचाप खड़े अभिजीत को सुन रहे थे। अभिजीत ने कहना जारी रखा- "इन लोगों के न रहने पर इनकी औलादें द...

विनम्र श्रद्धांजलि !

    चींटियों के झुण्ड की तरह उमड़ता जन-सैलाब! प्रशासन भी आखिर संभाले तो कैसे, इस अंधी आस्था को? कुछ लोग इसमें शामिल होकर मोक्ष प्राप्त कर ही लेते हैं, अपने पीछे रोते-बिलखते निकट संबंधियों को छोड़ कर।… और धर्मांध लोगों को प्रेरित करने वाले निर्मोही तथाकथित संत और कथावाचकों ( निर्मोही इसलिए कि वह तो तथाकथित रूप से मोह-माया छोड़ जो चुके हैं ) के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। वैसे भी वह कानों से ज़्यादा काम नहीं लेते, केवल उनकी जिव्हा चलती है। तो... जाते रहो धर्मान्ध मोक्ष-लाभार्थियों, ऐसी भगदड़ का हिस्सा बन कर मोक्ष पाने के लिए। परलोक सुधरेगा या नहीं, यह तो ईश्वर ही जाने, इहलोक ज़रूर बिगड़ जाएगा। मृतात्माओं को हम सभी की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 🙏🏼!

मुक्तक

                                                                                         मुक्तक            प्रभु से मेरी आरज़ू -                                                 रोटी मिले , कपड़ा मिले , छत मिले हर एक सिर को ,                                                माथे   पर...