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फिर अवसर नहीं मिलने वाला...

     कठिन परिश्रम और लम्बी प्रतीक्षा के बाद यदि कोई अवसर मिलता है तो समय से उसका पूरा-पूरा सदुपयोग कर लेना ही बुद्धिमानी है। इस सत्य को हर समझदार व्यक्ति जानता है पर सफलता के अहंकारवश अधिकांश व्यक्ति राह से भटक जाते हैं। सफलता की राह में बाधा बनकर कई विपरीत परिस्थितियां आती हैं लेकिन उन पर विजय प्राप्त कर अपनी राह पर निरन्तर आगे बढ़ने वाला सक्षम व्यक्ति ही इतिहास बनाता है। 
     हमारे समक्ष दो ऐसी हस्तियाँ हैं जिन्होंने राजनीति में चमत्कार कर दिखाया है। मैं बात कर रहा हूँ
मोदी जी, हमारे देश के प्रधान मंत्री और केजरीवाल जी, दिल्ली के मुख्य मंत्री के विषय में। इन दोनों ने ही जिस करिश्माई ढंग से राजनीति में जो मुकाम हासिल किया, वह विश्व भर में चर्चा का विषय बन गया था। दोनों ने एक समान तरीके से एक-दूसरे पर छींटाकसी के साथ अपना अभियान शुरू किया था और दोनों ने ही अभूतपूर्व सफलता भी हासिल की थी। मोदी जी ने कुछ ही समय में अपनी वाणी पर संतुलन पा लिया पर इस प्रक्रिया में केजरीवाल जी को कुछ अधिक समय लगा। फिलहाल काफी समय से दोनों के मध्य का शीत-युद्ध, विराम की अवस्था में है।
     दोनों ही नेता अपने कर्तव्य-निर्वाह के मामले में कहीं न कहीं पिछड़ रहे हैं। केजरीवाल जी की कुछ राजनैतिक विवशताएँ हैं और उनके पास एक सीमित क्षेत्र की ज़िम्मेदारी है, लेकिन मोदी जी व उनकी टीम के हस्ते पूरे देश का दायित्व है। अतः हम अपना ध्यान मोदी जी के कार्य-क्षेत्र की ओर केन्द्रित करेंगे। 
     मोदी जी के अनुयायी भले ही उनकी कार्यशैली  एवं उपलब्धियों का गुणगान करें, लेकिन आम आदमी क्या कहता है, वह महत्वपूर्ण है। अभी हाल ही अहमदाबाद से मुंबई मार्ग के लिए बुलेट ट्रेन चलाने के क्रियान्वयन की ओर जो कदम बढ़ाये गए हैं, आमजन उससे खुश नहीं है। इस महत्वाकांक्षी योजना से कहीं बहुत कम खर्च पर हवाई-यात्रा को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता था, जिससे यात्री के लिए यात्रा भी अधिक सस्ती होती। अभावग्रस्त जनता के लिए सुगम जीवन-निर्वाह अधिक ज़रूरी है। जिसके पांवों तले ज़मीन न हो उसे आसमान दिखाने के कोई मायने नहीं हो सकते।
      कुछ उपलब्धियाँ सरकार के खाते में अवश्य हैं, लेकिन महंगाई हर क्षेत्र में आसमान को छू रही है, टूटे-फूटे सड़क-मार्ग 'स्मार्ट सिटी' की परिकल्पना को मुंह चिढ़ा रहे हैं, युवा-वर्ग बेरोजगारी के चलते गुमराह हो रहा है, महिलाओं और मासूम बच्चे-बच्चियों के साथ बलात्कार और हत्याओं का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है और क़ानून व व्यवस्था के प्रति उत्तरदायी  प्रशासन और नेता-वर्ग ने आँखें बंद कर रखी हैं। अराजकता की जो स्थिति आज है वह रोम की उस घटना को चरितार्थ करती है-  "रोम जल रहा था और नीरो (सम्राट) बांसुरी बजा रहा था।"
       जनता के असंतोष की सुगबुगाहट अभी मदहोश राजनेताओं के कानों तक नहीं पहुँच रही है, यह पहुंचेगी तब, जब चुनावों के समय कर्ण-भेदी शोर में बदल जाएगी। 
     आर्थिक व सामाजिक मोर्चे पर लड़खड़ाती सरकार राजनैतिक मोर्चे पर भी कुछ विशेष नहीं कर पा रही है। अब वह समय नहीं रहा है जब चुनावी हवाई वादे जनता भूल जाया करती थी, अब तो वह गिन-गिन कर अपने वोटों का हिसाब मांगेगी। समान नागरिक संहिता का मुद्दा अभी तक अछूता पड़ा है, तो कश्मीर का धारा 370 का मुद्दा भी सरकार के लिए मधुमक्खी का छत्ता बना हुआ है। जब कोई काम  किया नहीं जा सकता तो उसे करने का वादा क्यों किया जाता है ?  क्या होगा यदि इन मुद्दों पर  कठोरता से अमल किया जाये, कुछ लोग विरोध ही तो करेंगे, कुछ लोग हताहत ही तो होंगे ! क्या आतंकवादियों और अलगाववादियों के कारण यह सब-कुछ देखने को नहीं मिला था, तो फिर एक सही और तर्कसंगत कार्य को दृढ़ता से करने में वही सब-कुछ होता है तो कैसी परेशानी, कैसी चिंता ?
    इस प्रक्रिया में यदि कुछ वोट एक वर्ग से कम मिलते हैं तो दूसरे वर्ग के वोट कई गुना बढ़ कर मिलेंगे, इसलिए वोटों की गणित में भी सरकार वाली पार्टी को कोई नुक्सान नहीं होने वाला। 
     तो मोदी जी, दृढ निश्चय कीजिए, अपनी पार्टी के शकुनि मामाओं को नज़रंदाज़ कीजिए, विपक्ष की भी  चिंता मत कीजिए। भारत का सुनहरा भविष्य आप तय कर सकते हैं,  कुछ कर दिखाइए, वरना फिर अवसर नहीं मिलने वाला
    

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