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डायरी के पन्नों से..."प्यार तुझे सिखला दूंगा"

मानवीय संवेदनाओं से जुड़े हुए रसों में से ही कोई एक रस शब्दों का आकार लेकर कविता को जन्म देता है। मेरी इस रचना ने भी कुछ ऐसे ही जन्म लिया था।             खामोशी में रहने वाले, घुट-घुट आहें भरने वाले, नफरत सबसे करने वाले, प्यार तुझे सिखला दूँगा। क्यों चाह तुझे है नफरत की, कब तूने खुद को जाना है? तू क्या है, तुझमें क्या है, तुझको मैंने पहचाना है होठों पर उल्लास बहुत है. आँखों में विश्वास बहुत है, तेरे दिल में प्यार बहुत ह यह भी मैं दिखला दूँगा।। ‘‘ख़ामोशी में … ‘’ गर थोड़ा सहस तुझमें है, दुनिया जो चाहे कहने दे, पलकों की कोरों से अपनी, यों जीवन-रस ना बहने दे। देख, अभी तुझको जीना है, कभी-कभी विष भी पीना है, दुनिया में फिर भी रहना है, गम तेरे अपना लूँगा।। “ख़ामोशी में … ” तुझसे कब चाहा है मैंने, जीवन का मृदुहास मुझे दे बस यही चाहता मैं तुझसे, तू अपना विश्वास मुझे दे। दिल के ज़ख्मों में पीर भरे, कुछ भाव गहन-गंभीर भरे, आँखों में थोड़ा नीर भरे, मैं खुद को बहला लूँगा।। “ख़ामोशी में … ” *********

डायरी के पन्नों से ... "एक रात..."

जो किशोरवय युवा अभी यौवनावस्था से गुज़र रहे हैं वह इसी काल को जीते हुए और जो इस अवस्था से आगे निकल चुके हैं वह तथा जो बहुत आगे निकल चुके हैं वह भी, कुछ क्षणों के लिए उस काल को जीने का प्रयास करें जिस काल को मैंने इस प्रस्तुत की जा रही कविता में जीया था।…     कक्षा-प्रतिनिधि का चुनाव होने वाला था। रीजनल कॉलेज, अजमेर में प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था मैंने उन दिनों। कक्षा के सहपाठी लड़कों से तो मित्रता (अच्छी पहचान ) लगभग हो चुकी थी, लेकिन लड़कियों से उतना घुलना-मिलना नहीं हो पाया था तब तक। अब चुनाव जीतने के लिए उनके वोट भी तो चाहिए थे, अतः उनकी नज़रों में आने के लिए थोड़ी तुकबंदी कर डाली। दोस्तों के ठहाकों के बीच एक खाली पीरियड में मैंने कक्षा में यह कविता सुना दी। किरण नाम की दो लड़कियों सहित कुल 12 लड़कियां थीं कक्षा में और उन सभी का नाम आप देखेंगे मेरी इस तुकबंदी वाली कविता में (अंडरलाइन वाले शब्द )। ... और मैं चुनाव जीत गया था।                     

डायरी के पन्नों से ..."महक उठेगा ज़र्रा-ज़र्रा"

मेरा अध्ययन-काल मेरी कविताओं का स्वर्णिम काल था। मेरी उस समय की रचनाओं में से ही एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ - "महक उठेगा ज़र्रा-ज़र्रा..."

डायरी के पन्नों से... "भीगे नयन निहार रहे हैं..."

          "भीगे नयन निहार रहे हैं"- मेरे ही द्वारा चयनित यह शीर्षक था कविता प्रतियोगिता के लिए, जब महाराजा कॉलेज, जयपुर में प्रथम वर्ष में अध्ययन के दौरान मैंने राज्यस्तरीय अंतर्महाविद्यालयीय  कविता-प्रतियोगिता आयोजित करवाई थी। मैं उस वर्ष कॉलेज की साहित्यिक परिषद 'साहित्य-समाज' का सचिव था। राज्य के कुछ स्थापित विद्यार्थी कवियों ने भी भाग लिया था उस प्रतियोगिता में। मैंने भी इस शीर्षक पर लिखी कविता में विरह-तप्त नायिका के उद्गारों को शब्दों में ढाला था। निर्णायकों द्वारा मेरी कविता सराही तो गई थी, लेकिन पुरस्कार नहीं पा सकी थी। उस समय के ख्यात विद्यार्थी-कवि 'मणि मधुकर' ने प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था।          मेरे उपनाम (तख़ल्लुस ) 'हृदयेश' (अन्य कवियों की तरह उपनाम लगाने का शौक मुझे भी चढ़ा था उन दिनों ) के साथ लिखी वह कविता मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ - ' भीगे नयन निहार रहे हैं '                तन-प्राणों से सजल स्वर, प्रियतम,तुम्हें पुकार रहे हैं।  देव! तुम्हारे सूने पथ को, भीगे नयन निह

डायरी के पन्नों से ..."तृतीय विश्व युद्ध" -------

   तृतीय विश्व-युद्ध सम्भवतः नहीं होगा, लेकिन कुछ देश जिस तरह की गैर ज़िम्मेदाराना हरकतें कर रहे हैं, उससे एक डरावने भविष्य का संकेत मिल रहा है। यदि अनहोनी होती ही है तो परिणाम क्या होगा? इसी कल्पना की उपज है मेरी यह कविता...!

डायरी के पन्नों से ..."प्रियतमे, तब अचानक..."

   विरहाकुल हृदय प्रकृति के अंक में अपने प्रेम को तलाशता है, उसी से प्रश्न करता है और उसी से उत्तर पाता है।      मन के उद्गारों को अभिव्यक्ति दी है मेरी इस कविता की पंक्तियों ने।    कविता की प्रस्तुति से पहले इसकी रचना के समय-खण्ड को भी उल्लेखित करना चाहूँगा।    मेरे अध्ययन-काल में स्कूली शिक्षा के बाद का एक वर्ष महाराजा कॉलेज, जयपुर में अध्ययन करते हुए बीता। इस खूबसूरत वर्ष में मैं प्रथम वर्ष, विज्ञान का विद्यार्थी था। इसी वर्ष मैं कॉलेज में 'हिंदी साहित्य समाज' का सचिव मनोनीत किया गया था। यह प्रथम अवसर था जब मेरे व अध्यक्ष के सम्मिलित प्रयास से हमारे कॉलेज में अंतरमहाविद्यालयीय कविता-प्रतियोगिता का आयोजन किया जा सका था। मेरा यह पूरा वर्ष साहित्यिक गतिविधियों के प्रति समर्पित रहा था और यह भी कि मेरी कुछ रचनाओं ने इसी काल में जन्म लिया था। साहित्य-आराधना के साइड एफेक्ट के रूप में मेरा परीक्षा परिणाम 'अनुत्तीर्ण' घोषित हुआ।      मुझे पूर्णतः आभास हो गया था कि अध्ययन सम्बन्धी मेरा भविष्य मुझे यहाँ नहीं मिलने वाला है अतः मैंने  जयपुर छोड़कर रीजनल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, अजमेर मे

डायरी के पन्नों से..."नारी की व्यथा"

      स्त्री ने त्रेता युग में सीता के रूप में तो द्वापर युग में द्रोपदी बन कर 'स्त्री' होने की पीड़ा को भोगा था और तब से अब तक कलियुग में भी भोगती चली आ रही है। हम अपने आपको कितना भी प्रगतिशील क्यों न कह लें, आज भी पुरुष की सोच नारी-जाति के प्रति संकीर्ण, स्वार्थपरक और भोगवादी है। पुत्री के जन्म पर आज भी अधिकांश माता-पिता उतने  प्रसन्न दिखाई नहीं देते जितने पुत्र के जन्म पर। सम्भवतः इसके पीछे पुत्री की सुरक्षा के प्रति आशंकित सोच ही उत्तरदायी होती है। समाज-सुधारकों के अथक प्रयासों तथा राजनेताओं के दावों / वादों के उपरान्त भी स्त्री आज भी असुरक्षित है। नारी-जीवन की पीड़ा के इसी पक्ष की झलक पाएँगे आप मेरी इस कविता 'नारी की व्यथा' में।      यह कविता मैंने अपने अध्ययनकाल में (रीजनल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, अजमेर में ) लिखी थी और कॉलेज के एक कार्यक्रम (कॉलेज हाउसेज़ की प्रतियोगिता ) में, जिसका मैंने सञ्चालन किया था, इसकी प्रस्तुति भी दी थी।                                                                                                    

डायरी के पन्नों से ..."जब कभी अकेले में..."

     कहते हैं कि मनुष्य ताउम्र मन से तो युवा ही रहता है (अपवादों को छोड़कर) और यह सही भी प्रतीत होता है, लेकिन मैं अपनी जो कविता यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ वह वास्तव में मेरे द्वारा उस समय लिखी गई थी जब

डायरी के पन्नों से ..."स्वतंत्रता-दिवस...(?)"

         15 अगस्त का पावन दिवस- हमें अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिल गई सन् 1947 में, हम स्वाधीन हो गए। लेकिन ... लेकिन क्या हम सच में स्वतन्त्र  हैं ?        हम आज भी स्वतन्त्र नहीं हैं, आज भी हमारे कई भाई-बहिन आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में परतन्त्र हैं। आज भी सफ़ेदपोश एक बड़ा तबका आम आदमी का रहनुमा बना हुआ है। देशी अंग्रेजों की हुकूमत आज भी अभावग्रस्त लोगों को त्रस्त कर रही है।       सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले, मेरी कविता के नायक 'मंगू' की वेदना को मैंने कविता लिखते वक़्त महसूसा है, अब...अब आप भी महसूस करना चाहेंगे न इस अहसास को ?         ( मेरी यह कविता पांच वर्ष पूर्व आकाशवाणी, उदयपुर से प्रसारित हुई थी। )                                                              

डायरी के पन्नों से ... "उसी उद्यान में..."

     प्राप्त करना ही प्रेम की अंतिम परिणिति हो, ऐसा सदैव नहीं होता। प्रेम एक साधना है, एक उपासना है, एक सम्पूर्ण जीवन है- यही दर्शाने का प्रयास किया है मैंने अपनी इस कविता में। कविता कुछ लम्बी अवश्य है किन्तु मेरे रसग्राही मित्रों को इसे पढ़कर आनन्द की एक अलग ही अनुभूति

डायरी के पन्नों से..."पगली वह प्रेमी पगला"

    रस-परिवर्तन करते हुए प्रस्तुत कर रहा हूँ अपनी सन् 1968 की यह हास्य कविता -             'पगली वह प्रेमी पगला...'                                                                                                   

डायरी के पन्नों से... "स्वर्ग मैंने देख लिया है"

     सन् 1971 की मेरी यह कृति "स्वर्ग मैंने देख लिया है" जगन्नियता ईश्वर की सुन्दरतम रचना 'नारी' के लिए है।  नारी उसके हर रूप में श्लाघनीय है, स्तुत्य है - इसी भावना को मैंने अपनी इस कविता में उकेरा है...                                  

डायरी के पन्नों से ... "सरस्वती-वन्दना"

     डायरी के पन्नों से...      सन् 1973 में अपने शब्द-पुष्पों से सृजित 'सरस्वती-वन्दना' से अपने ब्लॉग को अभिषिक्त कर रहा हूँ अपने लिए, मित्रों के लिए, अन्य सुधि पाठकों के लिए! अब से यदा-कदा मैं अपनी उन पूर्व रचनाओं से पाठकों का परिचय कराऊँगा जो मेरी तत्कालीन डायरी में संगृहित हैं। और...और उसके बाद यदि मन-आँगन में कविता ने जन्म लिया, यदि लेखनी मुखरित हुई, तो मेरी नई रचनाओं (कविता) से रूबरू होंगे पाठक-बन्धु।      प्रस्तुत कर रहा हूँ 'सरस्वती-वन्दना' -