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न्याय-प्रक्रिया का मखौल

    देखने में आया है कि अधीनस्थ न्यायालयों के कई निर्णय उच्चतर न्यायालयों में अपील होने पर टांय-टांय फिस्स हो जाते हैं। उच्चतर न्यायालयों में पिटने वाले निर्णय कभी तो तकनीकी खामियों के चलते पिटते हैं तो कभी दूषित भावनाओं से जानबूझ कर गलती किये जाने से। कई बार किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए कानूनी प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लम्बा खींचा जाता है। ऐसे सभी मामलों में न्यायाधिपति का अपराध क्षमा करने योग्य नहीं है। दूषित भावना से किये गए निर्णय के पीछे कभी-कभार सिफारिश होती है तो अधिकांश मामलों में धन-लोलुपता। इस प्रकार न्याय में जो विलम्ब होता है वह कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति का पूरा जीवन लील लेता है। आवश्यकता है इस बात की कि वर्तमान में परिवर्तन की जो आंधी चली है उसका समुचित उपयोग किया जाकर क़ानून में कड़े संशोधन कर जनता को सही मायने में न्याय उपलब्ध कराया जाय और ऐसे न्यायाधीशों को न्यायालयों की बजाय उनकी सही जगह दिखाई जाय।
   न्यायालयों के अलावा जिलाधीश कार्यालय, उपखंड अधिकारी कार्यालय, तहसील कार्यालय तथा ऐसे ही अन्य सरकारी कार्यालयों में जहाँ जनता को न्यायिक प्रक्रियाओं से गुज़ारना होता है, उसे ऐसी ही त्रासदी से रूबरू होना पड़ता है और सुनने को मिलता है कि हमने अपना फैसला दे दिया, तुम अपील कर सकते हो। यह अपील पीड़ित का कितना समय और धन बर्बाद करेगी, इसकी चिंता किसी को नहीं होती। आश्चर्य है कि इस समस्या को पूरी तरह से जानते हुए भी सरकार और न्यायविदों की आँखें नहीं खुल रही। 
   सावधान होकर समुचित कार्यवाही करने की आवश्यकता है इससे पहले कि जनता तंग आकर कानून अपने हाथ में लेने लगे। 

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