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मंजिल मौत की...!

     बारिश में सफर रूमानी भी होता है तो रोमांचक भी, लेकिन कई बार यह कहर भी बन जाता है हाल की एक घटना में मुम्बई की मशहूर बाइकर (biker) जागृति होगले बारिश में अपने सफर में एक गांव के पास की सड़क पर एक ट्रक को ओवरटेक करते समय एक गड्ढे के कारण असन्तुलित होकर गिरी और ट्रक उसे रौंदता हुआ निकल गया। सड़क पर पानी भरा होने से गड्ढा दिख नहीं पाया और एक हंसती-खेलती ज़िन्दगानी गुमनाम अंधेरों में खो गई।
     ऐसी ही बानगी आप-हम अपने शहर की व हाइवे की सड़कों पर तथा क्षत-विक्षत पुलियाओं पर अक्सर देखते हैं और कभी प्रशासनिक खामियों को कोसते हुए तो कभी अपने भाग्य को ज़िम्मेदार ठहराते हुए मन मसोस कर रह जाते हैं, क्योंकि अपनी ही चुनी हुई अपंग सरकार और उसके अकर्मण्य और दूषित मानसिकता के नुमाइन्दों की धृतराष्ट्री आँखों को यह सब दिखाई नहीं देता।
   हर वर्ष सड़कों का या तो सुधारीकरण किया जाता है या पुनर्निर्माण। सड़कें कभी ठीक से बनाई ही नहीं जाती क्योंकि यदि सड़कें गुणवत्तापूर्ण बना दी जाएँ तो सम्बन्धित ठेकेदारों और इंजीनियरों/नेताओं की अनवरत उदरपूर्ति कैसे हो सकेगी ? एक मामूली सी वर्षा होते ही सड़कें ऐसे टूट-फूट जाती हैं जैसे मिट्टी से बनी हों। नदी-नालों पर बनने वाली पुलियाओं की उम्र भी मुश्किल से एक या दो बरसात की ही होती है। हाइवे की सड़कों का हाल भी लगभग ऐसा ही नज़र आता है जबकि निर्धारित टोल टैक्स की पूरी वसूली के बाद भी जिम्मेदार ठेकेदारों के टोल टैक्स नाके अनवरत रूप से वसूली करते रहते हैं क्योंकि कोई कहने-पूछने वाला है ही नहीं, जैसा कि सुनने में आता है।
    तो इन खस्ताहाल सड़कों के कारण आपके-हमारे वाहन ख़राब हों, हाथ-पैर टूटें या फिर हम अल्लाह के प्यारे हो जाएँ, कुछ मामलों में अखबार की खबर बनने के अलावा और कुछ भी हासिल नहीं होता।
     ऐसा भी नहीं है कि मैं, इन पंक्तियों का लेखक और आप मेरे सुधि पाठकों के अलावा इन होने वाले हादसों से और कोई वाकिफ नहीं होता पर यथास्थितिवाद की मानसिकता के चलते कोई अधिक सोचने-करने का प्रयास ही नहीं करता। मैंने अमेरिका में वहां के कुछ प्रान्तों में जहाँ-जहाँ भी भ्रमण किया है (लगभग हर मौसम में), कहीं भी भग्न सड़कें नहीं देखीं। अमेरिका की छोड़िये, श्रीलंका जो हमारे देश के मुकाबले बहुत छोटा देश है, वहां के शहरों और गलियों की सड़कों को भी हमने देखा था गत वर्ष तो वहां की स्थिति भी बहुत अच्छी थी- साफ-सुथरी गड्ढोंरहित सपाट सड़कें! फिर हमारे यहाँ ऐसा क्यों है ?
    क्या इस समस्या का कोई उपचार या समाधान नहीं है ?
    सरकार बनाने वाले सांसद-ऍमएलए चुनाव-प्रचार में जितना पैसा बहाते हैं उसका अंश मात्र ही गुणवत्तापूर्ण सड़कें बनाने के लिए काफी हो जायेगा और यदि ऐसा किया जाये तो उन्हें जीतने के लिए चुनाव-प्रचार की ज़रुरत ही नहीं होगी। इसके अतिरिक्त स्वयं नगर निगमों / नगरपालिकाओं के पास ही इतनी धनराशि होती है कि जनहित का यह आवश्यक कार्य आसानी से सम्पन्न किया जा सकता है। अधिक टिकाऊ सड़कें बनाने के लिए ईमानदार देखरेख के साथ सीमेंट की सड़कें बनाने का विकल्प भी हो सकता है जिससे कि वर्षा का न्यूनतम प्रभाव उन पर होगा।
       तो  समाधान तो है,... बस इसके लिए चाहिए केवल इच्छाशक्ति और नेकनीयती !


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