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अधकचरा कानून !



    अंग्रेजों के समय का बना हुआ हमारा कानून आज पंगु प्रमाणित हो रहा है। समय की मांग है कि इसमें उचित संशोधन किये जाएँ। शासन-तंत्र की दुर्बलता और अयोग्यता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सज़ा भी क्रियान्वित नहीं की जा सकी।
    कई मामलों में झूठी गवाहियों ने कहीं तो दोषियों को मुक्त करवा दिया तो कई बार निर्दोषों को कारावास की कोठड़ी में सड़ने के लिए विवश किया है।
  सोहराबुद्दीन एनकाउन्टर के मामले को ही देखें हम। इस मामले में दिनेश एम. एन. (S.P.) जैसा निर्विवाद ईमानदार पुलिस अफसर अभी तक जेल में बंद है। आरोपित अफसर निरपराध हैं या अपराधी, यह तो न्यायलय ही बतायेगा, लेकिन यदि उस एनकाउंटर को फर्जी ठहराया जाता है तो भी ऐसे एनकाउंटर को अपराध क्यों माना जाये ? जैसा भी यह कानून है, मैं इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखता। यदि वह दुर्दान्त अपराधी बच निकलता तो न जाने कितने घर और तबाह करता और ज़िंदा पकड़ा भी जाता तो क्या गेरेंटी थी कि हमारा अधकचरा कानून उसे सज़ा दे ही पाता। सज़ा मिल भी जाती तो वह भीतर रह कर भी अपनी गैंग को कमांड करता रहता और फिर क्या वह पुण्यात्मा बन कर बाहर आता ?
  सभ्य समाज के दुश्मन ऐसे अपराधियों के साथ हुए फर्जी एनकाउंटर्स को कानून के नज़रिये से भले ही अपराध की श्रेणी में माना जाये, वस्तुतः देश और समाज के लिए तो यह वरदान ही होते हैं।
   आवश्यकता  इस बात की है कि कोई ऐसी संवेदनशील सरकार आये जो कानून में उचित संशोधन कर इसे अधिक उपयोगी और प्रभावी बना सके। 

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