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आखिर कब तक ?

  भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी मोदी जी ने गृहमंत्री शिंदे के बयान ( अल्पसंख्यक युवकों की गिरफ़्तारी के सम्बन्ध में ) को लेकर प्रधानमंत्री जी को लिखे पत्र में कहा है- " अपराध अपराध होता है। धर्म के आधार पर तय नहीं हो कि वह दोषी है या बेगुनाह। हमें सुनिश्चित करना होगा कि बिना भेदभाव के इन्साफ मिले। अपराधी का कोई धर्म नहीं होता। इस सियासत से तो देश नीचे चला जायगा।"
   मोदी जी ने इस मामले में तुरंत दखल की मांग की है।
  कितनी विचित्र और भयावह स्थिति है कि जिस बात की गम्भीरता को मोदी जी ही नहीं, हर आम आदमी समझ रहा है, क्यों प्रधानमंत्री जी को वह बात समझाने की ज़रूरत पड़ रही है। छद्म धर्म-निरपेक्षता का ताना-बाना जो इस शासक-वर्ग ने बुना है, उसमें स्वयं ही उलझकर इनकी पार्टी रहा-सहा जनाधार भी शीघ्र ही खो देगी - ऐसा प्रतीत हो रहा है। परिणामत: कॉन्ग्रेस में कुछ जो अच्छे नेता हैं उन्हें भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। गृहमंत्री जी को अपना बयान वापस ले देश से क्षमा मांगनी चाहिए।
   आश्चर्य इस बात का है कि नवोदित पार्टी 'AAP' ने इस विषय में अपनी नीति अभी तक स्पष्ट नहीं की है। न्यायोचित राजनीति ही व्यापक जन-समर्थन का आधार बन सकती है।
  हमारा देश धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन वोट-राजनीति के चलते किसी भी एक सम्प्रदाय के प्रति विशेष मोह-भाव निश्चित रूप से वर्ग-संघर्ष को जन्म देगा और इसके लिए उत्तरदायी राजनेताओं को आने वाली पीढ़ी कभी क्षमा नहीं कर सकेगी।
 शासक-वर्ग द्वारा लगातार किया जाने वाला भेदभाव बहुसंख्य समाज कब तक सहन कर सकेगा, आखिर कब तक ? किसी के भी धैर्य की परीक्षा अधिक समय तक नहीं ली जानी चाहिए।

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