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डायरी के पन्नों से ..."चंद रुबाइयाँ और मुक्तक"

मेरे अध्ययन-काल की रचनाएँ ...



     






मेरी  तुम  परवाह  करो  ना,  पथ   टटोल   लूँगा  अपना,
अगर  शमा   बुझा  दोगे   तो,  परवानों   का  क्या  होगा?
शबनम समझा शोलों को भी,अब तक स्वीकार किया है,
विश्वासों  ने  आहें  भर  लीं,  तो  अरमानों  का क्या होगा?

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