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अनुशासन की अनुशासनहीनता

      स्मरण है मुझे श्रीमती इन्दिरा गांधी के समय का आपातकाल! कई विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई थी; यहाँ तक कि टार्गेट के दबाव के चलते गैरशादीशुदा युवकों की
नसबन्दी जैसी ज्यादतियां भी की गईं थीं। ऐसा भी नहीं था कि सब कुछ ग़लत-ग़लत ही हुआ था उन दिनों, कुछ अच्छी बातें भी हुई थीं। सरकारी नुमाइन्दों के कार्य में सुधार दिखाई देने लगा था, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा था और लोगों की दिनचर्या भी अनुशासित होने लगी थी। कुछ बुद्धिजीवी तो यह भी  कहने लगे थे कि देश की जनता को इस खुराक की आवश्यकता थी और यह भी कि प्रशासनिक कठोरता ही हम लोगों (देशवासी) का सही इलाज है।
     यह सब कुछ था लेकिन ऐसा तो उस समय भी कम ही दिखाई देता था, जैसा मेरे द्वारा यहाँ संलग्न की गई पोस्ट में दिखाई दे रहा है। क्या भाजपाई राजनीति के पुरोधा अटल-आडवाणी और आज के भाजपाई शक्ति-केन्द्र मोदी-शाह की नीतियों के अनुकूल है यह सरकारी आचरण ? विरोध दर्ज कराने या अपनी बात कहने के अधिकार का ऐसा दमन क्या प्रजातान्त्रिक शासन-व्यवस्था में औचित्यपूर्ण है? यही वह सवाल हैं जो जन-मानस को उद्वेलित कर रहे हैं, समाधान मांग रहे हैं। क्या राजस्थान की राजनीति में मुख्यमंत्री वसुन्धरा जी की स्वीकार्यता के गिरते ग्राफ को ऐसे कृत्य और अधिक हानि नहीं पहुंचाएंगे?
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