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असमंजस में हूँ …



    अभी तीन-चार दिन पहले मैं अपने एवं मित्र-परिवार के साथ शहर की खूबसूरत झील फतहसागर पर रात्रि लगभग 10 बजे टहल रहा था। अनायास ही झील की पाल के नीचे इधर-उधर घूमते ड्यूटी कर रहे दो पुलिस-कर्मियों पर नज़र पड़ी। विचार आया कि यदि यह लोग अभी ड्यूटी पर नहीं होते तो शायद हमारी ही तरह अपने परिवार के साथ यहाँ टहलने का आनंद ले रहे होते। कैसी जटिल और नीरस ज़िन्दगी है इनकी- यह सोच मन में उनके प्रति करुणामिश्रित सम्मान जाग उठा।
   आज लखनऊ में शिक्षकों के द्वारा अपनी मांगों के लिए किये जा रहे आंदोलन के दौरान पुलिस ने जिस अमानवीय तरीके से लाठी-चार्ज किया- वह सब टीवी पर देखा। लग रहा था मानो युद्ध में दुश्मनों पर पूरी शक्ति के साथ आक्रमण किया जा रहा है। हल्के और सांकेतिक प्रहारों से ही उन्हें तितर-बितर करना निश्चित रूप से असंभव नहीं था। इस पुलिसिया क्रूरता के प्रति मन आक्रोश और घृणा से भर उठा।
   नहीं समझ पा रहा हूँ कि पुलिस के प्रति किस तरह के भाव को ह्रदय में स्थान दूँ ...

  

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