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Posted by me on Facebook...on Dt.18-9-13

हिन्दू हूँ, हिंदुत्व के प्रति समर्पित हूँ, लेकिन अन्य धर्मों एवं धर्मानुयायियों के प्रति पूर्ण आदर-सम्मान रखता हूँ। हिन्दुत्व का अपमान होते नहीं देख सकता, साथ ही हिन्दुओं की पारम्परिक धार्मिक सहिष्णुता का पक्षधर भी हूँ। छद्म धर्म-निरपेक्षता के प्रति घृणा-भाव है मन में और धार्मिक आस्था का दुरुपयोग करने वाले राजनीतिज्ञों को नारकीय कीड़ों की श्रेणी का जीव मानता हूँ मैं। 
हिन्दू- महासभा के प्रति भी आदर-भाव है जो हिन्दू होने के कारण होना भी चाहिए, लेकिन ऐसी धार्मिक संस्थाओं के मठाधीश जब अनर्गल बात कह जाते हैं तो मन उद्वेलित हो उठता है। अभी हाल ही तथाकथित संत आसाराम के कुत्सित कृत्यों पर पर्दा डालने का प्रयास करते हुए जब श्री अशोक सिंघल एवं श्री प्रवीण तोगड़िया ने आरोप लगाया कि संतों को बदनाम किया जा रहा है तो दुखद आश्चर्य हुआ। एक मासूम बच्ची का जीवन लगभग नष्ट हो गया है- यह भी नहीं देखा उन्होंने ? स्पष्टतः यह एक ओछी एवं अदूरदर्शी सोच का परिचायक है। होना यह चाहिए कि कपटतापूर्ण हथकण्डों को आधुनिक राजनीतिज्ञों के लिए ही छोड़ दिया जाय और धार्मिक संस्थाएं इससे मुक्त रहें। आ. सिंघल जी ने अभी हाल ही कहा है कि आडवाणी जी पिछले 40 वर्षों से भाजपा के मार्गदर्शक रहे हैं अतः अब उन्हें आराम करना चाहिए (मोदी जी की वर्तमान ताजपोशी के सन्दर्भ में आडवाणी जी के रुख के कारण) और अगली पीढ़ी को जगह देनी चाहिए, जो सही भी है, लेकिन क्या यह सलाह उनके स्वयं के सन्दर्भ में समीचीन नहीं होगी ?

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