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बन्धन (कहानी)






क्षमा और अनुज दो साल से एक-दूसरे के सम्पर्क में थे। वे कॉलेज के अन्तिम वर्ष में थे, तब से दोनों में दोस्ती थी जो बाद में प्यार में बदल गई थी। अनुपम सुन्दरी क्षमा एक परम्परावादी संस्कारी लड़की थी, जो शादी करने और परिवार बसाने का सपना देखती थी, जबकि अनुज एक नितांत आधुनिक विचारों वाला अल्हड़ नवयुवक था, जिसे एक स्वच्छन्द ज़िन्दगी पसन्द थी। दोनों की विचारधारा बुनियादी तौर पर भिन्न थी।

क्षमा कॉलेज के अपने सहपाठी लड़कों के आकर्षण का केंद्र थी, तो अनुज के प्रति अधिकांश सहपाठी लड़कियों का झुकाव था। इसके विपरीत क्षमा और अनुज के मन में मात्र एक-दूसरे के लिए चाहत थी। कॉलेज के उन सुनहरे दिनों में, पुस्तकालय की आलमारियों के गलियारों के बीच उनकी दोस्ती परवान तो खूब चढ़ी थी, लेकिन उनकी दुनिया कुछ मायनों में अलग थी। क्षमा एक ऐसी लड़की थी जो समाज में जड़ों की महत्ता जानती थी। वह घर की खुशबू, त्यौहारों की सादगी और एक स्थिर भविष्य में सुकून देखती थी। इसके विपरीत, अनुज के पैर हमेशा किसी अनदेखी राह पर निकलने को आतुर रहते थे। उसके लिए आधुनिकता का अर्थ था- बिना किसी जवाबदेही के जीना। वह अक्सर कहता- “क्षमा, यह दुनिया बहुत बड़ी है, हम एक घर की चारदीवारी में खुद को कैद कैसे कर सकते हैं?”

“अनुज, परिंदा चाहे कितनी भी ऊँची उड़ान भरे, शाम को उसे एक डाल की ज़रूरत होती है।” -क्षमा मुस्कुराकर जवाब देती। यही वैचारिक मतभेद उनके प्यार की राह में सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था।

एक दिन, क्षमा ने अनुज से उनके भविष्य के बारे में बात करने का फैसला किया।


क्षमा- “अनुज, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”

अनुज- “बोलो क्षमा!”

क्षमा- “क्या तुम्हें नहीं लगता कि अब समय आ गया है कि हम अपने रिश्ते को अगले स्तर पर ले जाएँ?”

अनुज- “तुम्हारा मतलब क्या है?”

क्षमा- “अनुज, हमें अब शादी कर लेनी चाहिए।”

अनुज- “शादी? क्षमा, हम इसके लिए अभी बहुत छोटे हैं।”

क्षमा- “हम छोटे नहीं हैं अनुज! हम दोनों पच्चीस साल के हैं, हमने ग्रेजुएशन कर लिया है और अब हम नौकरी भी कर रहे हैं। हम दो साल से एक-दूसरे के करीब हैं, हमें किसका इंतज़ार है?”

अनुज- “क्षमा, शादी एक बड़ा फैसला है। यह ऐसा कुछ नहीं है जो आपने आज सोचा और कल कर लिया।”

क्षमा- “मैं यह सब यूँ ही नहीं कह रही हूँ अनुज! मुझे तुमसे प्यार है। मैं अपना शेष जीवन तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूँ।”

अनुज- “मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ क्षमा, लेकिन मैं फिलहाल शादी के लिए तैयार नहीं हूँ।”

क्षमा- “क्यों? तुम किस बात से भयभीत हो?”

अनुज- “मैं किसी चीज़ से नहीं डरता, क्षमा! मैं बस अपनी आज़ादी नहीं खोना चाहता।”

क्षमा- “आज़ादी? तुम किस आज़ादी की बात कर रहे हो?”

अनुज- “अपनी जिंदगी अपनी इच्छानुसार जीने की आज़ादी। यात्रा करने, मौज-मस्ती करने, नये-नये लोगों से मिलने की आज़ादी।”

क्षमा- “अनुज, तुम मेरे साथ भी यह सब कर सकते हो। हम एक साथ यात्रा कर सकते हैं, घूम-फिर सकते हैं, एक साथ मौज-मस्ती कर सकते हैं, एक साथ नये लोगों से मिल सकते हैं।”

अनुज- “यह वैसा नहीं है क्षमा, जैसा तुम समझती हो।  विवाह जिम्मेदारियों, अपेक्षाओं और समझौतों के साथ आता है। वह एक बन्धन है। मैं वह सब नहीं चाहता।”

क्षमा- “तुम शादी को बन्धन समझते हो? यह क्यों नहीं कहते कि तुम मुझे नहीं चाहते?”

अनुज- ”मैंने ऐसा तो नहीं कहा क्षमा। मैं तुम्हें चाहता हूँ, प्यार करता हूँ, लेकिन शादी नहीं चाहता।”

क्षमा- “अनुज, तुम इसे दोनों तरह से नहीं कर सकते। तुम मुझे इस तरह लटकाए नहीं रख सकते। तुम्हें चुनना होगा।”

अनुज- “क्या चुनना होगा? किसमें से चुनना होगा?”

क्षमा- “मुझे और तुम्हारी आज़ादी के बीच, कोई एक।”

अनुज- “क्षमा, यह उचित नहीं है।”

क्षमा- “तुम जो चाहते हो, वह मेरे लिए उचित नहीं है अनुज! यह सम्भव नहीं है कि तुम मुझे इस बंधन में रखो और मेरी भावनाओं का सम्मान न करो और यह कि हमारे रिश्ते का कोई नाम न हो।”

अनुज- “क्षमा, ऐसा मत करो।”

“मुझे यह करना होगा अनुज। मेरे अपने लिए, हम दोनों के लिए।” -गहरी साँस ले कर क्षमा ने कहा।

अनुज को नहीं सूझा कि क्या बोले।

“अनुज, अगर तुम मुझसे शादी नहीं करना चाहते, तो हमारा रिश्ता आज से खत्म हुआ।” -क्षमा ने पुनः कहा और मुड़ कर चली गई।

उसे यूँ जाते देख अनुज स्तब्ध और अवाक् था। उसे एहसास था कि वह उससे बहुत प्यार करता है और उसे खोना नहीं चाहता, लेकिन उसका स्वच्छन्द स्वभाव व अहंकार उसे क्षमा को रोकने से इन्कार कर रहा था। उसने उसे जाने दिया।

इस तरह क्षमा अनुज की ज़िन्दगी से दूर चली गई। 

अलगाव के बाद के दो साल अनुज के लिए एक लंबी खोज थे। किस तरह की खोज, वह स्वयं भी नहीं जानता था। यथेष्ट पैसा साथ में लेकर निकला था, सो अर्थाभाव ने कभी उसे परेशान नहीं किया। उसने लद्दाख की वादियों में प्रकृति के बीच समय बिताया, गोवा के समुद्र तटों पर अजनबियों के साथ दिन बिताये; बड़े शहरों की चकाचौंध में खो जाना चाहा। वहाँ लोग तो उसे कई मिले, लेकिन कोई ऐसा नहीं मिला जो उसके दिल में क्षमा के चले जाने से रिक्त हुए स्थान को भर सके। उसने वह 'आज़ादी' ज़रूर पा ली थी जिसका उसने सपना देखा था, लेकिन यह आज़ादी धीरे-धीरे एक खोखले सन्नाटे में बदलने लगी। वह आज़ादी, जो पहले उसे जीत का अहसास कराती थी, अब उसके लिए एक बोझ बन चुकी थी। हर नई जगह पर उसे ऐसा लगता जैसे वह कोई बहुत ज़रूरी चीज़ पीछे छोड़ आया है- एक घर का पता, एक दिल की धड़कन।

ऋषिकेश की एक ठंडी शाम, जब वह गंगा किनारे अकेला बैठा था, उसे अचानक क्षमा की याद आई। उसे याद आया कि कैसे वह उसे अदरक वाली चाय का प्याला थमाते हुए कहती थी कि असली सुकून बाहर नहीं, भीतर होता है।

क्षमा से इतने लम्बे बिछोह ने अनुज को अपनी ग़लती का अहसास करा दिया था। वह उसे याद करता और सोचता, ‘वह कहाँ होगी… कैसी होगी?’ उसने कई बार चाहा कि उससे  मिलने का प्रयास करे, उसे ढूँढ निकाले और अपनी भूल का प्रायश्चित कर ले, किन्तु इस सोच के साथ ही उसकी झिझक या सम्भवतः अभिमान आड़े आ जाता और वह अपने विचार को झटक देता। 

इसी सब के बीच एक दिन अनुज अपने चचेरे भाई की शादी में जयपुर आया। जयपुर की वह शादी किसी रंगीन सपने जैसी थी- चारों ओर शहनाइयों की गूँज, गेंदे के फूलों की महक और रिश्तों का शोर। लेकिन उस भीड़ के बीच अनुज खुद को सबसे अलग-थलग महसूस कर रहा था।

 तभी उसकी नज़र दुल्हन की सहेलियों के बीच गुलाबी साड़ी में बहुत ही खूबसूरत लग रही एक युवती पर पड़ी। चेहरे पर मधुर मुस्कान लिये वह क्षमा थी। उसकी आँखों में एक ज्योति थी, जो अनुज ने पहले कभी नहीं देखी थी। उसे देखते ही अनुज के भीतर जैसे कुछ टूट गया। उसका अहंकार, जिसने दो साल पहले क्षमा को जाने देने से रोका था, अब बेमानी लगने लगा। उसे अहसास हुआ कि वह जिसे 'बन्धन' समझकर भाग रहा था, वह दरअसल वह लंगर था जो उसे तूफानों में डूबने से बचा सकता था। वह उसे देख रहा था और मन ही मन अपनी उस मूर्खता पर पछता रहा था, जिसे उसने कभी आज़ादी, अपना स्वाभिमान माना था।

क्षमा ने भी उसे देखा और उसके सीने में भी भावनाओं का ज्वार उमड़ा। वह अब भी उससे प्यार करती थी, लेकिन उसने उसके बिना जीना सीख लिया था।

दोनों ने औपचारिकता के साथ अभिवादन का आदान-प्रदान किया और सामान्य दिखने की कोशिश की। वह एक-दूसरे के प्रति ज़्यादा देर तक अजनबी बने नहीं रह सके, क्योंकि वे एक ही शादी की पार्टी का हिस्सा थे। अनुज ने पहल की और उसे अपने साथ नृत्य के लिए आमन्त्रित किया, तो क्षमा इन्कार नहीं कर सकी।

नृत्य के दौरान एक-दूसरे के स्पर्श एवं उठती-गिरती श्वांसों की टकराहट ने दोनों को रोमाञ्चित कर दिया। वे अपने बीच की पुरानी चिंगारी को फिर से महसूस कर रहे थे और सोच रहे थे कि क्या उनके पास अभी भी मौका है? सोच रहे थे, लेकिन खुल कर कुछ भी नहीं कह सके।

नृत्य के बाद प्रीति-भोज के दौरान अनुज मौका देख कर क्षमा के पास आया और बातचीत शुरू की। दोनों ने अभी तक शादी नहीं की है, यह बात भी दोनों की आपसी बातचीत में उजागर हो गई। बातों ही बातों में अनुज ने बताया कि वह अजमेर के जिलाधीश कार्यालय में सेक्शन ऑफिसर के पद पर काम कर रहा है। उसके द्वारा पूछे जाने पर क्षमा ने भी बताया कि उसकी पोस्टिंग इन दिनों किशनगढ़ में है। उसकी नौकरी बैंक में लग गई है। उसके कुछ अच्छे दोस्त भी हैं और वह अपनी ज़िन्दगी में बहुत ख़ुश है।

उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहे अनुज ने मुस्करा कर कहा- “क्षमा, तुम जितना ख़ुश स्वयं को दिखा रही हो, उससे तुम्हारे चेहरे के भाव मेल नहीं खा रहे।”

“तुम ग़लत समझ रहे हो अनुज, मैं सचमुच अपनी ज़िन्दगी में बहुत ख़ुश हूँ।” -क्षमा ने प्रत्युत्तर में कहा।

शादी खत्म होने के बाद दुल्हन की विदाई हो गई। अनुज और क्षमा ने भी भारी मन से एक दूसरे से विदा ली। 

 दूसरे दिन संयोग से दोनों का रेलवे स्टेशन पर फिर मिलना हो गया। क्षमा किशनगढ़ जा रही थी, जबकि अनुज को अजमेर जाना था। दोनों के गंतव्य अलग थे पर जाने वाली ट्रेन एक थी। ट्रेन आने में अभी समय था। एक-दूसरे से यदा-कदा नज़रें चुराते, दोनों आपस में इधर-उधर की बातें करते रहे। ट्रेन आने पर दोनों अपने कोच में चढ़ गए। संयोग से दोनों की सीटें एक ही कोच में थी। क्षमा के नज़दीक बैठे यात्री से प्रार्थना कर के अनुज ने उसे अपनी सीट पर भेज दिया और स्वयं क्षमा के पास आ कर बैठ गया। दोनों अपने जॉब के बारे में और अन्य बातें करते रहे, किन्तु अपने मन की बात कोई नहीं कह सका।

दो घंटे बाद किशनगढ़ आ गया। ट्रेन रुकी और क्षमा हाथ हिलाकर अपना बैग लेकर नीचे उतर गई। भारी मन लिये अनुज ने देखा, क्षमा के चेहरे पर भी उदासी की रेखाएँ उभर आई थीं।

प्लेटफॉर्म से बाहर आ कर अनमनी-सी क्षमा सड़क पर खड़ी हो टैक्सी का इन्तज़ार करने लगी। कोई भी टैक्सी उपलब्ध नहीं हो पा रही थी। कुछ मिनट की प्रतीक्षा के बाद सड़क पर लोगों की रेलमपेल के कारण वह तीन-चार कदम पीछे आ कर फुटपाथ पर खड़ी हो गई। अंततः एक टैक्सी सड़क पर ठीक उसके सामने आ कर रुक गई। उसने उचटती नज़रों से देखा, उसमें पहले से ही एक सवारी बैठी हुई थी। निराश हो कर उसने अपनी नज़र फेर ली। टैक्सी ड्राइवर ने आवाज़ दी- “आइये मेम, बैठिये।”

“मुझे शहर जाना है। लेकिन तुम्हारी गाड़ी में तो पहले से सवारी बैठी है।”

“मैं शहर ही जा रहा हूँ। आप गाड़ी में बैठिये।”

“तुम्हारा दिमाग़ ख़राब है।” -क्रोधित हो कर बोली क्षमा और दूसरी तरफ देखने लगी।

तभी टैक्सी में बैठा युवक उतर कर उसके निकट आया और बोला- “क्षमा!”

क्षमा चौंकी, यह तो अनुज की आवाज़ है। उसने सामने देखा, सच में ही अनुज था।

“अनुज, तुम?”

जवाब में अनुज मुस्कुरा दिया।

“लेकिन तुम तो अजमेर जा रहे थे न! यहाँ कैसे?”

“हाँ, मुझे आगे जाना था, किन्तु मैं भी यहीं उतर गया। बहुत समय तुमसे दूर रह लिया हूँ, अब नहीं रहना चाहता। तुम्हारी और मेरी मंज़िल अब अलग-अलग नहीं हो सकती क्षमा! मुझे तुम्हारा बन्धन स्वीकार है।”

क्षमा अवाक् उसे देखे जा रही थी।

“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिया है क्षमा, मुझे माफ़ कर दो।” -अनुज भावुक हो उठा था।

“मेरा अहम् भी तो मुझे तुमसे दूर किये हुए था। तुम भी मुझे माफ़ कर दो अनुज!” -अनुज के करीब आ कर कहा क्षमा ने। उसकी आँखें छलछला आई थीं। 

टैक्सी ड्राइवर और आस-पास खड़े लोगों की नज़रों से बेखबर दोनों ने एक-दूसरे को अपनी बॉंहों में भर लिया।

********* 


Comments

  1. बहुत सुंदर भावपूर्ण कहानी ।

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    1. हार्दिक धन्यवाद महोदया!

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