Skip to main content

कौन ज़िम्मेदार है...



    कौन ज़िम्मेदार है रेलवे के ताज़ा इंटरसिटी-हादसे में हुए नुकसान के लिए ? राहगीरों और वाहनों के निरन्तर प्रवाह वाली व्यस्त सड़कों पर भी इसी तरह आवारा पशुओं (गायें, भैंसें, कुत्ते, आदि) का जमावड़ा हर समय लगा रहता है जो गाहे-बगाहे कई हादसों का सबब बनता है। त्रस्त जनता अपने किसी प्रिय को या तो अस्पताल में पाती है या कभी उसे हमेशा के लिए खो देती है। कभी सरकारी मुहिम चलने पर आवारा पकड़े गए पशुओं के मालिक मामूली सी पेनल्टी चुका कर अपने पशुओं को छुड़ा लेते हैं और आगे पुनः बेशर्मी का यह आलम कायम रहता है। 
समझ से परे है कि प्रशासन इस मुद्दे पर गम्भीर क्यों नहीं हो पाता। यदि क़ानून कमज़ोर है तो उसे बदला जाय और ऐसी सख्ती की जाये कि पशुओं के मालिक फिर कभी पशुओं को यूँ खुला छोड़ने की जुर्रत न कर सकें। जब सुसंस्कृत अन्य देशों में कोई भी आवारा पशु सार्वजनिक स्थानों पर कभी दिखाई नहीं देता, तो हमारे देश में ऐसी कौन सी विवशता है कि इस समस्या का हल नहीं निकल पा रहा है। केवल और केवल एक ही कारण प्रतीत होता है इसके पीछे और वह है वोटों की राजनीति के चलते राजनेताओं में इच्छा-शक्ति का अभाव !
मैं इस तथ्य से भी अवगत हूँ कि कुछ बुद्धिजीवी मित्र मेरे विचारों से सहमत होंगे, लेकिन नेता …, इसलिए मेरी यह पोस्ट सार्थकता नहीं पा सकेगी। सिवाय कुछ likes और comments के कुछ भी हासिल नहीं हो सकेगा मेरी इस पोस्ट को....:(

Comments

Popular posts from this blog

श्राद्ध (लघुकथा)

अभिजीत तन्मय हो कर वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों को खाना खिला रहा था। परोसगारी में आश्रम का एक कर्मचारी राघव भी उसकी मदद कर रहा था।  "हाँ जी, आ जाइये।" -दरवाज़े पर एक व्यक्ति को खड़ा देख राघव ने कहा।   अभिजीत ने पलट कर देखा, उसका चचेरा भाई परेश आया था।  "भाई साहब, भाभी ने मुझे बताया कि आप यहाँ हैं, जबकि मैंने पहले ही आपको सूचित कर दिया था कि आज सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध है और मेरे यहाँ ब्राह्मण-भोज होगा। आपको भी भाभी के साथ मैंने अपने यहाँ निमंत्रित किया था न! मैं आपको लेने आया हूँ।" -परेश आते ही बोला।  "परेश, तुम उन पूर्वजों की शांति के लिए यह श्राद्ध करते हो, जिन्हें तुमने नहीं देखा, जबकि चाचा जी को वृद्धावस्था में अकेले छोड़ कर तुम अपने बीवी-बच्चों के साथ पृथक फ्लैट में रहते हो। क्या यह युक्तिसंगत है?... इन बुज़ुर्गों को देख रहे हो परेश? इनमें से कुछ लोग तो अपनी संतान के दुर्व्यवहार के कारण यहाँ हैं और कुछ को उनकी औलादों ने ही यहाँ छोड़ रखा है। ..." परेश और राघव चुपचाप खड़े अभिजीत को सुन रहे थे। अभिजीत ने कहना जारी रखा- "इन लोगों के न रहने पर इनकी औलादें द...

विनम्र श्रद्धांजलि !

    चींटियों के झुण्ड की तरह उमड़ता जन-सैलाब! प्रशासन भी आखिर संभाले तो कैसे, इस अंधी आस्था को? कुछ लोग इसमें शामिल होकर मोक्ष प्राप्त कर ही लेते हैं, अपने पीछे रोते-बिलखते निकट संबंधियों को छोड़ कर।… और धर्मांध लोगों को प्रेरित करने वाले निर्मोही तथाकथित संत और कथावाचकों ( निर्मोही इसलिए कि वह तो तथाकथित रूप से मोह-माया छोड़ जो चुके हैं ) के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। वैसे भी वह कानों से ज़्यादा काम नहीं लेते, केवल उनकी जिव्हा चलती है। तो... जाते रहो धर्मान्ध मोक्ष-लाभार्थियों, ऐसी भगदड़ का हिस्सा बन कर मोक्ष पाने के लिए। परलोक सुधरेगा या नहीं, यह तो ईश्वर ही जाने, इहलोक ज़रूर बिगड़ जाएगा। मृतात्माओं को हम सभी की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 🙏🏼!

मुक्तक

                                                                                         मुक्तक            प्रभु से मेरी आरज़ू -                                                 रोटी मिले , कपड़ा मिले , छत मिले हर एक सिर को ,                                                माथे   पर...