आंसू थम नहीं रहे हैं ...बलात्कारी दरिन्दों ने दिल्ली में मेडिकल की छात्रा के साथ जो बहशियाना हरकत की है और उनकी जिस पैशाचिक पराकाष्ठा ने उस मासूम की सांसें भी छीन ली हैं उसे देखते हुए उन राक्षसों के अंग विच्छेद कर दिए जाने चाहियें। नहीं, यह सजा कम होगी, उन्हें फांसी या सूली पर चढ़ा दिया जाना चाहिये। नहीं, उनके टुकड़े-टुकड़े कर के चील-कौओं के सामने फ़ेंक दिया जाना चाहिए। नहीं, नहीं, नहीं ...उनके पाप के लिए ये सजाएं काफी नहीं होंगी, कोई बताये हमारे देश के रहनुमाओं को, न्याय के रक्षकों को या फिर मानवाधिकार के अनुयाइयों को, कि मानवता पर कलंक, उन जंगली भेड़ियों ( भेड़िये क्षमा करें इस तुलना के लिए) के लिए क्या सजा तजवीज हो ? प्रश्न है मेरा- 'क्या उम्र-कैद की वर्तमान अधिकतम सजा उन हैवानों के लिए काफी होगी ?'
अभिजीत तन्मय हो कर वृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों को खाना खिला रहा था। परोसगारी में आश्रम का एक कर्मचारी राघव भी उसकी मदद कर रहा था। "हाँ जी, आ जाइये।" -दरवाज़े पर एक व्यक्ति को खड़ा देख राघव ने कहा। अभिजीत ने पलट कर देखा, उसका चचेरा भाई परेश आया था। "भाई साहब, भाभी ने मुझे बताया कि आप यहाँ हैं, जबकि मैंने पहले ही आपको सूचित कर दिया था कि आज सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध है और मेरे यहाँ ब्राह्मण-भोज होगा। आपको भी भाभी के साथ मैंने अपने यहाँ निमंत्रित किया था न! मैं आपको लेने आया हूँ।" -परेश आते ही बोला। "परेश, तुम उन पूर्वजों की शांति के लिए यह श्राद्ध करते हो, जिन्हें तुमने नहीं देखा, जबकि चाचा जी को वृद्धावस्था में अकेले छोड़ कर तुम अपने बीवी-बच्चों के साथ पृथक फ्लैट में रहते हो। क्या यह युक्तिसंगत है?... इन बुज़ुर्गों को देख रहे हो परेश? इनमें से कुछ लोग तो अपनी संतान के दुर्व्यवहार के कारण यहाँ हैं और कुछ को उनकी औलादों ने ही यहाँ छोड़ रखा है। ..." परेश और राघव चुपचाप खड़े अभिजीत को सुन रहे थे। अभिजीत ने कहना जारी रखा- "इन लोगों के न रहने पर इनकी औलादें द...
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