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संस्कार (लघुकथा)

       


        विपुल से विदा ले कर अर्चना घर पहुँची। दोपहर हो गई थी। उसके मम्मी-पापा लीविंग रूम में बैठे थे। उसकी मम्मी एक पत्रिका पढ़ रही थी और पापा किसी केस को देखने में व्यस्त थे। वह सीधी पापा के पास गई और अपने हाथ में पकड़ा स्टाम्प पेपर उनके सामने रख दिया।

 “क्या है यह? कहाँ गई थी तू?”, कहते हुए योगेश्वर प्रसाद ने स्टाम्प पेपर को उठा कर ध्यान से देखा और पुनः  बोले- "यह क्या है अर्चू? तू कोर्ट मैरिज कर रही है?... देख लो शारदा, अपनी बेटी की करतूत!"

शारदा ने चौंक कर अपने पति की ओर देखा और फिर अर्चना की तरफ आश्चर्य से देखने लगीं। 

"पापा, मैं कोर्ट से आ रही हूँ। आप मेरी शादी आशीष से करना चाहते हैं, जबकि विपुल उससे कहीं अधिक अच्छा लड़का है। वह पढ़ने में अच्छा है, स्वभाव से भी अच्छा है और एक चरित्रवान लड़का है। वह गरीब घर से है पापा, पर इसमें उसका तो दोष नहीं है न! आशीष पैसे वाले घर से सम्बन्ध अवश्य रखता है, किन्तु व्यक्तित्व में वह विपुल के आगे कहीं नहीं ठहरता। और फिर पापा, मेरी तक़दीर तो आपने नहीं लिखी है न? आपने अपने हिसाब से मेरी शादी पैसे वाले घराने में कर भी दी और फिर भी मेरे नसीब में सुख नहीं लिखा हो तो? आप लोग मुझे सुखी कैसे बना सकेंगे? विपुल अच्छा लड़का है, मुझे स्वयं से भी ज़्यादा प्यार करता है और मेरे लिए कुछ भी कर सकता है। इससे अधिक बेहतर मेरे लिए आप क्या चाहेंगे?

"जब तूने निश्चय ही कर लिया है तो मुझे यह सब बताने क्यों आई है? मैं तुझसे हार गया अर्चू !" -उद्विग्न स्वर में योगेश्वर प्रसाद ने कहा और शादी की अर्जी का दस्तावेज़ टेबल पर रख दिया। 

शारदा ने करुण दृष्टि से पति की ओर देखा। आँखों से अश्रु-कण लुढ़क कर उनके आँचल पर आ गिरे। 

अर्चना ने टेबल पर रखे दस्तावेज़ को उठाया और उसे फाड़ कर फर्श पर फेंक कर बोली- "लेकिन पापा, मैंने विपुल को मना कर दिया है। अभी मैंने जो कुछ कहा, वह विचार मेरे मन के थे, लेकिन मेरे दिमाग़ ने मेरे मन का साथ नहीं दिया। जब विपुल और मैं अदालत के ऑफिस में जा रहे थे, मम्मी की एक बात अचानक मेरे दिमाग़ में कौंध गई। मम्मी ने किसी बात पर मुझे बताया था कि आप मेरे जन्म के पहले से वकालत कर रहे हैं और किसी भी केस में आप अभी तक हारे नहीं हैं। फिर पापा, मैं आपकी हार का कारण कैसे बन सकती हूँ? आप लोगों ने मुझे इतना पढ़ाया है। मैं उचित नहीं लगने पर आपका विरोध तो कर सकती हूँ, किन्तु विद्रोह नहीं कर सकती। अपने घर के संस्कार मुझे इसकी इजाज़त नहीं देते। मैं आप दोनों से क्षमा चाहती हूँ और आपकी इच्छा को सम्मान देने के लिए लौट आई हूँ।" -अर्चना की आँखें नम थीं। 

"लेकिन बेटा, हार तो मैं फिर भी गया हूँ।" -योगेश्वर प्रसाद ने स्निग्ध दृष्टि से अर्चना की आँखों में देख कर कहा। 

"वह कैसे पापा?"

"तेरी स्पष्टवादिता और समझदारी ने मुझे पराजित कर दिया है अर्चू! मैं अब बहुत खुश हूँ। हम कल ही तेरा शगुन लेकर लड़के वालों के वहाँ जायेंगे।"

"पापा, वह लोग रिश्ता स्वीकार तो करेंगे न? मैंने आशीष से रिश्ते के लिए उस दिन उनके मुँह पर ही इंकार जो कर दिया था।" -अर्चना ने शंका व्यक्त की।

"पगली, हम शगुन लेकर आशीष के घर नहीं, विपुल के घर जायेंगे। हमारी बेटी की शादी कोर्ट में नहीं, धूम-धाम से होगी।"

"पप्पा..." -मधुर नाद के साथ हर्षातिरेक में अर्चना दौड़ कर अपने पापा से लिपट गई। शारदा की आँखें फिर डबडबा आईं, किन्तु इस बार यह आँसू प्रसन्नता के थे।



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Comments

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२१-०८-२०२१) को
    'चलो माँजो गगन को'(चर्चा अंक- ४१६३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. नमस्ते अनीता जी! मेरी रचना को चर्चा अंक में स्थान देने के लिए आपका बहुत आभार महोदया!

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  2. यदि माता पिता और बच्चे दोनों एक दूसरे की खुशी कक ख्याल रखे तो घर सकरग बन सकता है। सुंदर लघुकथा।

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    1. बहुत धन्यवाद ज्योति जी!

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  3. बच्चे जब माता पिता की इच्छा का सम्मान करते हैं तो माता पिता भी बच्चों की खुशयों को अनदेखा नहीं करते । सुंदर लघुकथा ।।

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  4. मेरी इस रचना को 'पांच लिंकों का आनंद' के पटल हेतु चयनित किये जाने के लिए आपका हार्दिक आभार महोदया संगीता जी!

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  5. बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदल रहा है... बच्चों का स्पष्टवादी होना और माता-पिता का बच्चों का साथ देना सुखद है...
    –सकारात्मक अन्त लिए सुन्दर कथा
    –शीर्षक पर पुनः विचार किया जा सकता है..

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    1. धन्यवाद महोदया ! ... और कोई उपयुक्त शीर्षक सूझा ही नहीं विभा जी!

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  6. इस हार में भी जीत है सबकी।

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    1. जी, प्रवीण जी ! बहुत धन्यवाद!

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  7. माता-पिता और बच्चों के बीच का स्नेह और सामंजस्य परिवार के आत्मीय बंधन कभी टूटने नहीं दे सकती।
    सुंदर संदेशात्मक कहानी।
    सादर।

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    1. बहुत आभार आपका श्वेता जी!

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  8. संस्कार परिवार की अमूल्य देन है ... बहुत सुंदर और प्रेरक भी ..

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    1. हार्दिक धन्यवाद सदा जी!

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  9. हृदय स्पर्शी एवं प्रेरक कथा । आज एवं कल की पीढ़ी को यह कथा अवश्य सुननी चाहिए और अमल भी करना चाहिए । अति सुन्दर सृजन ।

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    1. सुन्दर उत्साहित करती टिप्पणी के लिए बहुत आभार महोदया!

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  10. सुंदर संदेश देती कथा, संस्कार और स्नेह ।
    बहुत सुंदर।

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  11. बेहद खूबसूरत सृजन

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