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आखिर कब तक ? (कहानी)

 


 "पापा मैं दो घंटे में ज़रूर लौट आऊँगी। मेरी कुछ फ्रेंड्स मुझे अलग से बर्थडे ट्रीट दे रही हैं। वहाँ से लौट कर मैं अपने घर के फंक्शन में शामिल हो जाऊँगी।… प्लीज़ पापा!... मम्मी, पापा को बोलो न, मुझे परमिशन दे दें।" -धर्मिष्ठा ने आजिज़ी करते हुए कहा।
  "अरे बेटा, नहीं मानती तो जा आ। लेकिन देख, अपने रिश्तेदारों और तेरी फ्रैंड्स के अलावा मेरे स्कूल-स्टाफ से एक मित्र भी सपरिवार आ रहे हैं। अभी चार बज रहे हैं, छः बजे तक हर हालत में आ जाना। तब तक तेरी मम्मी और मैं पार्टी की व्यवस्था देखते हैं।" -धर्मिष्ठा के अध्यापक पिता प्रथमेश जी ने उसका कन्धा थपथपाते हुए प्यार से कहा।


  धर्मिष्ठा कुलांचे भरती हुई अर्चना के घर पहुँची। अर्चना उसकी घनिष्ठ सहेली थी तथा कॉलेज में उसके साथ ही फर्स्ट ईयर में पढ़ती थी। उसके पापा बैंक में क्लर्क थे। अर्चना ने सजी-धजी धर्मिष्ठा को देखा तो देखती ही रह गई, बोली- "क़यामत ढा रही हो जान! आज तो यह बिजली कहीं न कहीं गिर कर ही रहेगी।” 'धत्त' कहते हुए धर्मिष्ठा ने उसके गाल पर हलकी-सी चपत लगाई।
“अंकल-आंटी कहाँ हैं? उनसे भी मिल लेती हूँ।" -धर्मिष्ठा ने कहा।
 “मम्मी-पापा किसी रिश्तेदारी में गये हैं, सात-साढ़े सात बजे तक लौटेंगे। दो मिनट बैठ तू, मैं तैयार हो कर आती हूँ। रूपेश अभी कार ले कर आ ही रहा है, वह बाहर पार्क के पास मिलेगा।“ -अर्चना ने जवाब दिया और भीतर चेंज करने चली गई।  
 तैयार हो कर वह धर्मिष्ठा को ले कर बाहर पार्क के पास पहुँच गई। । 

  रूपेश शहर के एक प्रतिष्ठित वकील का इकलौता बेटा था और धर्मिष्ठा का क्लास फैलो होने के साथ ही उसका बॉय फ्रेंड भी था। दोनों उसकी प्रतीक्षा करने लगीं। कुछ ही देर में रूपेश की कार आ गई। वह और अर्चना दोनों कार के पास गईं। दोनों ने देखा, रूपेश के साथ कपिल और मोहनीश भी थे। वह दोनों भी उनके क्लास फैलो थे। कपिल के पापा का आभूषण का व्यवसाय था और मोहनीश विद्युत् विभाग के एक कॉन्ट्रैक्टर का पुत्र था।
  दोनों कुछ कहतीं, इसके पूर्व ही रूपेश ने कहा- "हाय गर्ल्स! आते वक्त यह दोनों भी घर आ गए थे।  इन दोनों को आज ही डिबेट कॉम्पीटीशन में जाने के लिए शाम की फ्लाइट पकड़नी है तो इन्हें भी साथ ले आया। और हाँ, हैप्पी बर्थडे धर्मिष्ठा! हम तो ट्रीट का पूरा इन्तज़ाम भी कर लाये हैं, देखो भीतर। ट्रीट के बाद  इन लोगों को एयर पोर्ट पर ड्रॉप कर बाद में तुम लोगों को घर छोड़ दूँगा। क्या ख़याल है?"
  अर्चना और धर्मिष्ठा ने कार में पीछे की सीट पर देखा, कुछ पैकेट्स मोहनीश के पास सीट पर और कुछ नीचे रखे थे। दोनों ने मुस्कराते हुए सहमति दे दी।
  "लेकिन सब लोग गाड़ी में आयेंगे कैसे? पैकेट्स पीछे डिक्की में क्यों नहीं रख देते?" -अर्चना ने सुझाव दिया।
 रूपेश हँसा- "भई, तुम्हारा दोस्त बुद्धू तो नहीं है जो उसे इस बात का ध्यान नहीं आता। दरअसल इन दोनों का बैगेज रखा है उसमें।"
 "यार रूपेश, ऐसा कर, तू इनको ले कर चल।  मैं ऑटो में आ जाता हूँ।" -आगे बैठे कपिल ने कहा।
 "नहीं कपिल, मैं रुक जाती हूँ, मुझे तो वैसे भी शाम को धर्मिष्ठा के घर की पार्टी में जाना ही है। रूपेश ने इतने उत्साह से धर्मिष्ठा को ट्रीट देने के लिए बुलाया है तो तुम लोग एन्जॉय करो।"
 "नहीं अर्चना, मैं अकेली नहीं जाऊँगी। तुम नहीं आओगी तो मैं भी नहीं जाऊँगी।" -धर्मिष्ठा थोड़ी असहज हुई।
"नहीं यार धर्मिष्ठा, रूपेश का दिल टूट जाएगा। देख न, कैसे उतर गया है उसका चेहरा!" -कहते हुए अर्चना ने कपिल का हाथ पकड़ कर खींचते हुए उसे पीछे की सीट पर जाने के लिए कहा। कपिल पीछे की सीट पर जगह बना कर बैठ गया और अर्चना ने धर्मिष्ठा को आगे की सीट पर लगभग धकेल ही दिया।
 "अरे-अरे क्या करती है? -सीट पर ठीक से बैठते हुए धर्मिष्ठा ने अर्चना की और कृत्रिम रोष से देखा और रूपेश की तरफ देख कर मुस्करा दी। अर्चना ने हल्की स्मित दी और पीछे बैठ गए कपिल को 'सॉरी' कह कर अपनी नज़रें झुका ली। मन ही मन वह  कपिल के प्रति कुछ आसक्त थी, अतः साथ न जा पाने का दुःख भी था उसके मन में। अर्चना ने धर्मिष्ठा के लिए यह त्याग किया था। 
   रूपेश का चेहरा खिल गया। उसने अर्चना को 'थैंक्स' कहा और कार आगे बढ़ा दी।
  "ओके डिअर अर्चना, घर पर मिलती हूँ लौट कर।" -धर्मिष्ठा ने कार की खिड़की से पीछे देखते हुए कहा। अर्चना ने भी मुस्कराते हुए हाथ हिला दिया। 
  अर्चना अपने घर पर लौटते वक्त सोच रही थी, 'वह लोग ट्रीट के लिए जा कहाँ रहे हैं, यह पूछना तो मैं भूल ही गई। चलो, लौटने पर धर्मिष्ठा से ही पूछ लूँगी।' 

  रूपेश धीमे-धीमे कार चला रहा था। कार के म्यूज़िक प्लेयर से सुरीली धुन आ रही थी- 'मेरा तन डोले, मेरा मन डोले, मेरे दिल का गया करार रे, हो कौन बजाये...'
  धर्मिष्ठा ने सहसा पूछा- "रूपेश, हम जा कहाँ रहे हैं?"
 "वहीं, जहाँ कोई, आता जाता नहीं... " -रूमानी आवाज़ में रूपेश ने कहा। उसके इस अंदाज़ से सभी हँस पड़े।
 धर्मिष्ठा अपने सवाल का जवाब ढूँढने के लिए रूपेश का चेहरा देखने लगी।
  "अरे यार, धर्मिष्ठा का बर्थडे है, कहीं अच्छी जगह ही चलेंगे न!... अरे भई, हम लोग नकूचिया डैम जा रहे हैं।" -रूपेश ने मुस्कराते हुए पुनः कहा।
"नकूचिया डैम!... पर वह तो यहाँ से इक्कीस किलोमीटर दूर है ... इतनी दूर जाएंगे? मुझे जल्दी ही घर लौटना है यार! पापा से केवल दो घंटे की परमीशन मिली है।"
"तो क्या हुआ? चालीस मिनट आने-जाने के और बाकी समय अपना।" -कार की गति बढ़ाते हुए रूपेश ने कहा।  पीछे बैठे कपिल और मोहनीश आपस में अपनी धुन में कुछ बतिया रहे थे।
 धर्मिष्ठा मन ही मन सोच रही थी कि समय पर वापस घर पहुँचना ही होगा वरना पापा नाराज़ होंगे, मेहमान भी तो तब तक आने शुरू हो जायेंगे। उसने निश्चय कर लिया कि वह सब को वहाँ से जल्दी ही वापस चलने के लिए कह देगी।

 लगभग 25 मिनट में वह नकूचिया डैम पहुँच गये।
  मोहनीश साथ लाई हुई चादर डैम के किनारे पर बिछाने लगा तो रूपेश ने कहा- "नहीं यार मोहनीश, मुझे पानी से डर लगता है, थोड़ा इससे दूर ही बिछा।"
 "हाँ यार, दूर ही बिछा। मैं भी डरती हूँ पानी से। हम दोनों को ही तैरना जो नहीं आता।" -धर्मिष्ठा भी मुस्कराते हुए चहकी।
 मोहनीश ने हँसते हुए किनारे से थोड़ी दूर एक समतल जगह पर चादर बिछा दी। शहर से दूर होने के कारण यहाँ लोग सामान्यतः शनिवार-रविवार को ही आते थे। आज शुक्रवार था इसलिए कोई अन्य व्यक्ति यहाँ नहीं था। कार का दरवाज़ा खुला रख कर उन्होंने म्यूज़िक प्लेयर में एक कैसेट लगा दी जिससे एक अंग्रेजी गाने की धुन प्रसारित होने लगी। सभी ने चिप्स, नमकीन वगैरह का नाश्ता किया व एक-एक पीस केक का लिया।

  रूपेश कार की साइड-पॉकेट में रखी व्हिस्की की बोतल ले कर आया व गिलासों में पैग बनाने लगा तो धर्मिष्ठा ने ऐतराज़ किया- "यह क्या कर रहे हो रूपेश? यार, तुम्हारे साथ एक लड़की भी बैठी है, तुम्हें पता है?"
  "अरे डिअर, इसके बिना ट्रीट कैसी? तुम्हें थोड़ी ही देंगे, चिंता मत करो।"
 "नहीं, मैं नहीं लेती, तुम्हें पता है। तुम्हें भी अभी नहीं लेनी चाहिए। यह मैनर्स में नहीं आता रूपेश।" -नाराज़गी भरे स्वर में धर्मिष्ठा बोली।
 "तुम भले ही मत लो, पर यार, बर्थडे है तुम्हारी! हमें तो सेलेब्रेट करने दो।" -रूपेश हँसते हुए बोला।
 "भई रूपेश, तुम्हें लेनी हो तो लो, मैं तो नहीं लूँगा। धर्मिष्ठा साथ में है इसलिए यह ठीक नहीं है।" -कपिल ने कहा
"मैं भी नहीं लूँगा, तू तो जानता है मैं बहुत कम ही लेता हूँ। आज बिल्कुल  मूड नहीं है, फिर सफर भी तो करना है।"
"तू भी नहीं लेगा, वह भी नहीं लेगा, तो सालों आये किसलिए हो यहाँ?- उखड़ गया रूपेश।
 आखिर कपिल और मोहनीश दोनों को रूपेश की बात माननी पड़ी। तीनों दोस्तों ने दो-दो पैग लिये। रूपेश ने मना करते-करते भी एक पैग और ले लिया।

 धर्मिष्ठा वहाँ से उठ कर डैम के किनारे चली गई। वह रूपेश की बेहूदगी से बहुत नाराज़ थी और अपने यहाँ आने के निश्चय पर झुंझला रही थी, 'इस रूपेश ने मेरी फीलिंग्स को भी कोई तवज़्ज़ो नहीं दी। मैं अब इससे दोस्ती नहीं रखूँगी , कहता है मुझे बहुत चाहता है... हुँह, देख लिया आज, कैसी चाहत है उसकी!', सोचते-सोचते उसने सिर को एक झटका दिया और फिर डैम के आस-पास की खूबसूरती में खो गई।

 अचानक पीछे से अपने कंधे पर हाथ का स्पर्श पा धर्मिष्ठा ने पीछे मुड़ कर देखा, रूपेश मादक नज़रों से उसे देखते हुए मुस्करा रहा था। धर्मिष्ठा ने देखा, कपिल और मोहनीश कार के पास नहीं थे।
"वह दोनों उधर घाटी में सैर करने निकल गये हैं डिअर धर्मिष्ठा! उन्हें आने में देर लगेगी। आओ, अपन दोनों तुम्हारा बर्थडे सेलेब्रेट करें।" -रूपेश ने धर्मिष्ठा को बाँहों में भरने की कोशिश की।
  धर्मिष्ठा ने रूपेश के हाथ हटाते हुए कहा- "तुम यह क्या कर रहे हो? तुम मेरे दोस्त हो, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ। मर्यादा को लांघने की कोशिश मत करो रूपेश! दूर हटो मुझसे।"
  रूपेश ने उसे जवाब नहीं दे कर पुनः अपने आगोश में लेने का प्रयास किया।
 धर्मिष्ठा ने जोर से धक्का मार कर रूपेश से स्वयं को छुड़ाया, घृणा से फुफकारते हुए बोली- "तुम नशे में जानवर हो गए हो। दूर हटो मुझसे और मुझे मेरे घर छोड़ दो।"
 "पहले मुझे सेलेब्रेट तो करने दो धर्मिष्ठा रानी!"- बलपूर्वक धर्मिष्ठा को अपने हाथों में उठा कर वह कार के पास ले आया। नशा उस पर पूरी तरह सवार हो गया था। जन्मदिन के कारण सजी-धजी धर्मिष्ठा व वहाँ के एकांत ने रूपेश के नशे को और हवा दे दी थी। यह जगह ऐसी थी, जो एक तरफ हट कर थी और यदि कोई अन्य व्यक्ति वहाँ आ भी जाता तो एकबारगी उसकी नज़र वहाँ नहीं पड़ती।
 धर्मिष्ठा कसमसाई, कातर स्वरों में रूपेश से उसे छोड़ देने की प्रार्थना की, चिल्लाई भी, रूपेश को नोचने की भी कोशिश की, किन्तु उसकी एक न चली। अंततः रूपेश में आ बसे हैवान ने उसके विश्वास को, उसकी आबरू को कुचल ही दिया।
  यह घिनौना खेल यहीं नहीं रुका, इसी बीच वहाँ लौट आये कपिल और मोहनीश ने भी एक के बाद एक, उसे रौंद डाला।
रूपेश चाह कर भी कुछ नहीं कह पाया।

तन और मन से घायल मासूम धर्मिष्ठा जमीन पर पड़ी सिसक रही थी।  उसका करुण  रुदन आस-पास की पहाड़ियों ने सुना, डैम में जल की तरंगों ने भी सुना, लेकिन नहीं सुना तो उसके ही साथी तीनों पिशाचों ने, जो डैम के पास खड़े-खड़े सिगरेट के कश ले रहे थे।
 कुछ देर बाद धर्मिष्ठा लड़खड़ाते हुए अपनी जगह पर उठ खड़ी हुई। अपने वस्त्र ठीक कर धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वह रूपेश के निकट पहुँची और घृणा व क्रोध भरी नज़रों से उसे देखते हुए बोली- "तू रूपेश!,... तूने मेरे साथ ऐसी घिनौनी हरकत की! उफ़्फ़, तुझे पहचानने में इतनी बड़ी भूल कैसे कर दी मैंने? तूने मेरी आत्मा को छलनी-छलनी कर दिया है। मैं..."
 "अरे जान, थोड़ी चढ़ गई तो हो गई ग़लती! माफ़ कर दो हमें, गुस्सा थूक दो यार!" -रूपेश ढींठतापूर्वक बोला। "थूकूँगी तो तुझ पर कमीने!" -आगबबूला हो कर धर्मिष्ठा ने रूपेश के मुँह पर थूका और चीख कर बोली- "तुम लोग सोचते हो, मैं खामोश रहूँगी? मैं तुम सब को जेल भिजवाऊँगी ज़िन्दगी भर तक सड़ने के लिए।"
  खतरा भाँप कर तीनों ने चौंक कर एक-दूसरे की ओर गहरी निगाहों से देखा। रूपेश ने रुमाल निकाल कर चेहरे से थूक साफ किया, शांत भाव से मुस्कराया और धर्मिष्ठा की ओर बढ़ते हुए बोला- "गज़ब करती हो यार! अपने रूपेश पर ही थूक दिया तुमने!"
 धर्मिष्ठा रूपेश का यह निर्लज्ज भाव आश्चर्य से देख ही रही थी कि अचानक उसने धर्मिष्ठा को दोनों हाथों पर उठा लिया। धर्मिष्ठा अशक्त होने के बावज़ूद ताकत लगा कर उसके हाथों से छिटक कर उन्मुक्त हुई, किन्तु कपिल और मोहनीश दोनों ने उसे उठाने में रूपेश को मदद की और अपनी कैद में छटपटा रही धर्मिष्ठा को ले कर डैम के किनारे की ओर बढ़े।
 धर्मिष्ठा उनकी पकड़ से मुक्त होने की कोशिश करती हुई चीखती रही और फिर  'छपाक' की एक तेज़ आवाज़ के साथ उसकी चीख डैम के खामोश वातावरण में खो गई। 
  यह सब उन तीनों के लिए भी शायद आकस्मिक ही था, क्योंकि ऐसा हो जायगा और ऐसा करना पड़ेगा, उन्होंने भी नहीं सोचा था। फ्लाइट के लिए बहुत देर हो चुकी थी सो तीनों वहीं से घर लौट गये। कपिल और मोहनीश ने घर पर वापस लौटने का एक बहाना गढ़ लिया।
  उधर प्रथमेश जी और उनकी पत्नी, बेटी धर्मिष्ठा की प्रतीक्षा करते-करते परेशान हो रहे थे। सात बज रहे थे और धर्मिष्ठा अभी तक नहीं लौटी थी। उसके फोन का स्टेटस स्विच ऑफ आ रहा था। अर्चना सहित धर्मिष्ठा की कुछ सहेलियाँ आ गई थीं और प्रथमेश जी का सहकर्मी भी अपनी पत्नी व दो बच्चों के साथ आ चुका था। पड़ोसी परिवार एवं दो-तीन रिश्तेदार-परिवार ही आने शेष थे अब। हॉलनुमा कमरे के मध्य में रखी बड़ी मेज पर बीचोंबीच केक रखा गया था। सोफ़ा और कुर्सियों पर बैठे मेहमान प्रथमेश जी व उनकी पत्नी के परेशान चेहरों से बेखबर हॉल में बज रहे संगीत की मधुर स्वर-लहरी का आनंद लेते हुए आपसी बातचीत में मशग़ूल थे। 

  आठ बज गये थे। शेष अन्य मेहमान भी आ चुके थे, किन्तु धर्मिष्ठा अभी तक नहीं लौटी थी। अर्चना भी अब परेशान हो रही थी। उसका धर्मिष्ठा के साथ नहीं जा पाने का अफ़सोस हवा हो चुका था। धर्मिष्ठा की अर्चना के साथ जाने की योजना के बारे में किसी को कोई अनुमान नहीं था अतः उससे किसी ने भी कुछ नहीं पूछा। वह स्वयं भी बता नहीं सकती थी कि धर्मिष्ठा किसके साथ गई है क्योंकि वह जानती थी कि उसके पैरेन्ट्स कुछ रूढ़िवादी थे और उन्हें बेटी का लड़कों के साथ पार्टी में जाना कतई स्वीकार्य नहीं होता। उसने एक ओर खिसक कर मोबाइल की साउण्ड धीमी कर धर्मिष्ठा को फोन लगाया पर वह अभी भी स्विच ऑफ़ ही बता रहा था। उसने रूपेश और कपिल को भी फ़ोन लगाया पर दोनों जगह 'नो रिप्लाई' रहा। वह असमंजस में थी कि क्या करे, क्या न करे! 

   साढ़े आठ बज गये। धर्मिष्ठा की अनुपस्थिति में केक काटने का तो सवाल ही नहीं उठता था। प्रथमेश जी ने वहाँ मौज़ूद अर्चना और धर्मिष्ठा की अन्य सहेलियों से यह जानने के लिए पूछताछ की कि धर्मिष्ठा की कौन सी सहेलियां उसे ट्रीट देने वाली थीं, लेकिन सब ने अनभिज्ञता जाहिर की। उनके पास अर्चना के अलावा उसकी किसी अन्य सहेली का फोन नंबर नहीं था अतः उनको तसल्ली देने के लिए अर्चना ने कुछ अन्य सहेलियों को फोन किया और फिर निराशा दर्शाते हुए सिर हिला दिया। सभी मेहमानों को पता लग गया कि धर्मिष्ठा बाहर से अभी तक नहीं आई है सो एक-एक कर सभी लोग बिना कुछ खाये-पीये प्रथमेश जी को नमस्कार कह एक-दूसरे से कानाफूसी करते हुए वहाँ से निकलने लगे। बदहवास से प्रथमेश जी क्षमा मांगने की मनःस्थिति में भी नहीं थे, बस हाथ जोड़ कर सब को विदा करते रहे। उनकी बहिन और साली जी का परिवार अभी रुका हुआ था। धर्मिष्ठा की मम्मी का रो-रो कर बुरा हाल था। 

  प्रथमेश जी अब हताश हो चले थे। मेहमानों के जाते ही अपने बहनोई को साथ ले कर वह पुलिस को सूचना देने के लिए अपने क्षेत्र के थाने में पहुँचे। कुछ आनाकानी के बाद थानेदार ने रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के निर्देश अपने अधीनस्थ को दिये और प्रथमेश जी को आश्वस्त किया कि यद्यपि बिना किसी पुख्ता जानकारी के लड़की का पता लगना बहुत मुश्किल है फिर भी वह पूरी कोशिश करेंगे। प्रथमेश जी अपने साथ धर्मिष्ठा का फोटो भी लाये थे जो उन्होंने थानेदार को दे दिया।
थानेदार ने प्रथमेश जी से पूछा- "लड़की किसी बात से घर से नाराज़ हो कर तो नहीं गई है? वह घर से अकेली गई थी या किसी के साथ?"
प्रथमेश जी ने जवाब दिया- "नहीं साहब, वह घर से अकेली ही गई थी। कह रही थी, उसकी कुछ फ्रेंड्स उसे अलग से ट्रीट देना चाहती  हैं। आज उसका बर्थडे है और वह बड़े ही अच्छे मूड में थी।" 
 थानेदार ने इस बात के लिए उन्हें लताड़ा भी कि बच्ची से बिना जानकारी लिये कि वह कहाँ और किसके साथ जा रही है, उन्होंने उसे भेज कैसे दिया।  
  थाने से लौटते समय प्रथमेश जी की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी, 'धर्मिष्ठा तुम कहाँ हो बेटा? कहाँ ढूंढूँ मैं तुम्हें? हे ईश्वर, हे दयालु! जहाँ भी हो मेरी बच्ची, उसकी रक्षा करना।' वह स्वयं को क्षमा नहीं कर पा रहे थे कि धर्मिष्ठा से पूरी जानकारी लिये बिना उन्होंने उसे भेज दिया था।

   शनिवार की सुबह अर्चना ने धर्मिष्ठा की मम्मी को फोन किया तो पता चला कि धर्मिष्ठा अब तक नहीं लौटी थी। अर्चना का माथा ठनका। उस दिन केवल एक क्लास थी, फिर भी अर्चना कॉलेज गई। कपिल व मोहनीश तो बाहर जाने वाले थे सो गए होंगे, लेकिन रूपेश से तो धर्मिष्ठा के बारे में पता चल सकेगा, वह सोच  रही थी।      
रूपेश कॉलेज नहीं आया था। अर्चना ने उसे कॉल लगाया, लेकिन आज फिर 'नो रिप्लाई' ही रहा।

   'माजरा क्या है? धर्मिष्ठा कहाँ है? रूपेश कॉलेज क्यों नहीं आया? कहीं धर्मिष्ठा के साथ कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं कर दिया उन लोगों ने?... नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकते।...  पर फिर हुआ क्या है... कुछ तो गड़बड़ है!', अर्चना की सांसें तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थीं। 'क्या वह धर्मिष्ठा की मम्मी को सच बता दे? लेकिन अभी तक तो कुछ बताया नहीं, अब कैसे कहेगी वह? उन लोगों ने पुलिस में रिपोर्ट तो दर्ज करा ही दी है, मैं क्यों इस झमेले में अपनी टांग फँसाऊँ? मम्मी-पापा को भी मैंने अभी तक कुछ नहीं बताया है सो मुझे खमोश ही रहना चाहिये। भगवान करे, धर्मिष्ठा के साथ कुछ बुरा न हुआ हो। सोमवार को तो रूपेश से मिलना होगा ही, तब पता चल जायेगा उससे।', अर्चना ने स्वयं को समझाया कि रूपेश से मिलने तक उसे खामोश ही रहना चाहिए।
  
   शहर के अख़बारों में धर्मिष्ठा के गायब हो जाने की खबर प्रमुखता से छपी थी।
  दो दिन तक पुलिस ने हर तरह से धर्मिष्ठा को ढूँढने की कोशिश की, लेकिन उसका कुछ पता न चल सका। पुलिस ने कयास लगाया कि लड़की अवश्य ही किसी के साथ भाग गई है। थानेदार ने शहर के पुलिस अधीक्षक से भी इस केस के सिलसिले में संपर्क किया एवं उनके निर्देशानुसार प्रथमेश जी से प्राप्त धर्मिष्ठा के फोटो की प्रतियाँ बनवा कर शहर के सभी थानों में भिजवा दी। पुलिस अधीक्षक ने अन्य समीस्थ जिलों में भी फोटो की स्कैन प्रति भिजवा दी व केस की गंभीरता समझते हुए अपने समकक्षों से मामले में रुचि लेने की गुज़ारिश की। 
   सोमवार को धर्मिष्ठा के कॉलेज में भी पुलिस ने जांच-पड़ताल की। उसके कुछ सहपाठी लड़के-लड़कियों से भी पूछताछ की, किन्तु कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका। अर्चना के अलावा उसकी क्लास के सभी विद्यार्थी उपस्थित थे। कौन-कौन आज कॉलेज में नहीं आया है, यह पूछे जाने पर अर्चना की फ्रेंड्स ने बताया कि अर्चना बीमार है अतः आज कॉलेज नहीं आई है। उसके अलावा सभी छात्र उपस्थित थे।

 थानेदार ने शहर के सभी पोखर-तालाबों में भी गोताखोरों से तलाश करवाई लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ, जिससे उनके इस ख़याल को मज़बूती मिली कि लड़की या तो किसी के साथ भागी है या कोई भगा ले गया है। प्रथमेश जी और उनकी पत्नी बदहवास थे। एक तरफ बच्ची का गायब हो जाना और दूसरी तरफ लोगों के बीच चल रही ऊल-जलूल चर्चाएँ! अपनी बेटी को भली-भांति जानते थे वह सो पुलिस के विचारों से या अख़बारों की बकवास से कतई इत्तफ़ाक नहीं रखते थे, किन्तु बदनामी तो हो ही रही थी। 
  
  घर पर बुखार में तप रही अर्चना पश्चाताप कर रही थी, 'काश, मैंने धर्मिष्ठा को कार में धकेलने के बजाय वहीं रोक लिया होता!... हाय! क्या हुआ होगा धर्मिष्ठा के साथ?... अवश्य ही कुछ न कुछ अशुभ हुआ है। मैं सब को कैसे बताऊँ कि धर्मिष्ठा रूपेश और उसके दोस्तों के साथ गई थी। पता नहीं, वह लोग उसको कहाँ ले गए होंगे, क्या किया होगा उस मासूम के साथ? यह तो ठीक था कि कार में जगह नहीं थी, अन्यथा कपिल के मोहपाश में बंधी मैं भी साथ गई होती तो पता नहीं, मेरे साथ भी क्या होता!'
 इसी तरह नित्य उसे यह विचार आते और दुःख के आवेग में वह कई बार तो रो पड़ती थी।
 वह इतनी डर गई थी कि अब किसी को भी फोन करने का साहस नहीं कर पा रही थी। पाँच-छः दिन लगे उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में।
   सोमवार को दोपहर रूपेश के घर गाँव से कुछ मेहमान आ गये थे सो रूपेश के पिता, वकील मनोहर सिंह गंगवाल ने फोन कर रूपेश को कॉलेज से घर बुला लिया। मेहमानों को नकूचिया डैम घुमाने का कार्यक्रम तय हुआ था। एक ट्वेल्व सीटर वैन भी मंगवा ली गई थी। रूपेश को पता लगा तो वह डैम के नाम से घबराया। उसने आनाकानी की पर वकील साहब के फरमान के आगे उसकी एक न चली।
 वकील साहब तो व्यस्त होने के कारण साथ नहीं जा सके, अतः रूपेश अपनी मम्मी और मेहमानों को ले कर नकूचिया डैम के लिए तैयार हुआ। वैन का ड्राइवर होशियार था, केवल बीस मिनट में उसने गंतव्य पर पहुँचा दिया।

  काफी देर इधर-उधर घूमने के बाद सब लोग उस जगह के पास पहुँचे जहाँ रूपेश और उसके दोस्तों ने धर्मिष्ठा को डैम में फेंका था। सहसा रूपेश ने देखा डैम के किनारे के पास धर्मिष्ठा खड़ी है। वह चकरा गया, 'ऐसा कैसे सम्भव है? वह तो तैरना जानती ही नहीं थी, फिर बच कर निकली कैसे और यदि बच भी गई थी तो अभी तक अपने घर क्यों नहीं गई?' उसने अपनी आँखें मली और जब खोलीं तो देखा कि वह उसे इशारे से बुला रही है।
  रूपेश घबराया, क्या करे, जाय उसके पास या नहीं? यदि नहीं गया और उसने चिल्ला कर सब को सावधान कर दिया तो? नहीं-नहीं, उसे जाना ही होगा। सब लोग डैम की खूबसूरती को निहार रहे थे। वह सब की नज़र बचा कर धर्मिष्ठा की ओर बढ़ चला।

  धर्मिष्ठा उसे अपने साथ कुछ दूर एकांत में ले गई। एक जगह रुकने पर धर्मेश ने उसे ध्यान से देखा। उसने उस दिन वाली ड्रैस ही पहनी हुई थी और वैसी ही खूबसूरत लग रही थी।
  "सॉरी धर्मिष्ठा! मेरी उस दिन की ग़लती माफ़ करने लायक नहीं है,लेकिन फिर भी मैं तुमसे क्षमा चाहता हूँ।…लेकिन तुम तो तैरना नहीं जानती हो न, पानी से बाहर कैसे आई?... और अभी तक तुम अपने घर क्यों नहीं गई?" -रूपेश ने अचरज से पूछा। 
"यहाँ पास के ही एक गाँव के कुछ लोगों ने मुझे डैम से निकाल कर बचा लिया था। तुमने मेरे साथ इतना घिनौना बर्ताव किया है धर्मेश कि मुझे अब शहरी ज़िन्दगी से नफरत हो गई है। मैं रोज़ शाम को दो घंटे यहाँ आ कर बैठती हूँ, फिर गाँव में उन लोगों के पास लौट जाती हूँ। कभी मन ने कहा तो ही घर लौटूंगी।... लेकिन रूपेश, तुमने मेरे साथ इतनी पशुता क्यों की? अरे, ऐसा तो एक पशु भी नहीं करता।... तुम तो मुझे प्यार करते थे न? क्या तुम्हारे लिए मैं केवल एक शरीर थी, और कुछ भी नहीं?... फिर उन दोनों ने भी... और वह भी तुम देखते रहे... छिः! मैं उन दोनों की क्या कहूँ, जब तुमने ही... तुम में शर्म तो नहीं थी पर ज़रा-सी दया भी नहीं आई मुझ पर?... इसके बाद तुम लोगों ने तो अपनी तरफ से मेरी ज़िदगी भी ख़त्म ही कर दी थी। खैर, अब चले जाओ तुम! मुझे तुम्हारे वज़ूद से भी घिन आ रही है।"
 रूपेश ख़ामोशी से उठा और छोटे-छोटे क़दमों से लौट गया।
"अरे, तुम कहाँ चले गए थे बेटा?" -रूपेश की माँ ने पूछा।
"कहीं नहीं माँ, इधर ही था। चलें अब घर?" -रूपेश ने बात टाल दी और सब लोग घर को लौट चले।

  अगले दिन मंगलवार को रूपेश ने जब कपिल व मोहनीश को बताया कि धर्मिष्ठा ज़िंदा है तो दोनों ऐसे चौंके, जैसे कि बिजली के नंगे तार ने छू लिया हो उनको। एकबारगी तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ, किन्तु जब रूपेश ने उसके साथ हुई अपनी बातचीत का ब्यौरा बताया तो वह यह सब जान कर चिंतित हो उठे।
 तीनों ने मिल कर फिर से डैम पर जा कर धर्मिष्ठा को ठिकाने लगाने की योजना बनाई। बुधवार की शाम तीनों मोहनीश की कार से डैम पर पहुँचे। दूर से ही तीनों ने देखा, धर्मिष्ठा उसी जगह डैम की ओर मुँह किये बैठी थी। रूपेश ने दोनों को वहाँ मौजूद एक बड़े पत्थर की शिला के पीछे छिप कर देखने को कहा और हिदायत दी कि उसका इशारा मिलने पर ही वह उनके पास आयें।

  रूपेश मंद गति से आगे बढ़ा। जैसे ही निकट पहुँचा, धर्मिष्ठा ने पीछे मुड़ कर उसकी ओर देखा और
मुस्कराते हुए खड़ी हो गई।
  "मैंने तुम्हें कल बहुत भला-बुरा कहा रूपेश, किन्तु अब मैं तुम पर गुस्सा नहीं हूँ। मैं उसे अपनी नियति समझ कर सब भूल जाना चाहती हूँ। तुम भी किसी को उस वाकये के बारे में मत बताना। तुम कल आ कर मुझे ले जाना यहाँ से। मैं गाँव वालों को आज बोल दूँगी।" -धर्मिष्ठा की आवाज़ में संजीदगी थी। 
 "ओह मेरी अच्छी धर्मिष्ठा! तुमने मुझे माफ़ कर दिया। तुम कितनी अच्छी हो!" -रूपेश का निश्चय डगमगाने लगा।               उसे आश्चर्य हो रहा था, 'धर्मिष्ठा ने क्या वाकई सब को माफ़ कर दिया है! अगर कहीं उसने धोखा दिया और शहर पहुँच कर सब को बता दिया तो?' वह उहापोह में ही था कि धर्मिष्ठा ने उसकी कमर में हाथ डाल कर कहा- "तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है न? तुम विश्वास करोगे भी कैसे, जब तुम खुद ही मेरा विश्वास तोड़ चुके हो।... पर रूपेश मैं सचमुच तुम्हें अब भी प्यार करती हूँ और पिछले सारे दर्द को भूल जाना चाहती हूँ जो तुमने मुझे दिया है।"
रूपेश उस पर अब भी विश्वास नहीं कर पा रहा था। 
  अब तक दोनों फिर उसी किनारे के ठीक पास आ चुके थे जहाँ से धर्मिष्ठा को फेंका गया था। रूपेश ने कुछ निश्चय कर आहिस्ता से अपनी कमर से धर्मिष्ठा का हाथ हटाने का उपक्रम किया, किन्तु अप्रत्याशित रूप से धर्मिष्ठा ने उसकी कमर को अधिक मज़बूती से पकड़ कर उसको साथ लिये हुए ही डैम की गहराई में छलांग लगा दी।

  शिला के पीछे खड़े कपिल व मोहनीश ने दोनों को गिरते देखा और भाग कर किनारे पर पहुँचे। नीचे पानी में ऊपर-नीचे हो रहे रूपेश ने हाँफते हुए 'बचाओ-बचाओ' की गुहार लगाई। मोहनीश पानी में कूदने को हुआ लेकिन कपिल ने उसे रोक लिया- "पागल मत बन, हम लोग उसे बचाने को कूदे तो धर्मिष्ठा का प्रेत हमें भी साथ ले जायेगा। देख नहीं रहा तू? धर्मिष्ठा कहीं नहीं दिख रही, जब कि रूपेश पानी के ऊपर दो बार आ चुका है। वह धर्मिष्ठा का प्रेत था मोहनीश! चल, यहाँ से भाग चलें।"
 रूपेश फिर बाहर नहीं आ आ पाया और गहराई में डूबता चला गया। दोनों के चेहरे से हवाइयाँ उड़ रही थीं। जैसे-तैसे कार दौड़ाते हुए वह घर लौटे।

  इस बार रूपेश की गुमशुदगी अख़बारों की मुख्य खबर बनी।
 शुक्रवार को डैम के पास के गाँव वालों ने डैम में एक लाश तैरती हुई देखी और किसी ने शहर में जा कर सूचना दी। पुलिस ने लाश बाहर निकलवाई तो एक सिपाही ने लाश को हल्की फूली हुई होने के बावज़ूद पहचान लिया और बोला- "अरे, यह तो वकील गंगवाल साहब का लड़का है।"

  पुलिस दल के साथ आये सर्किल ऑफिसर के दिमाग में सहसा एक विचार आया, 'कुछ दिन पहले धर्मिष्ठा के गायब होने के सिलसिले में शहर की सभी झीलों में गोताखोरों से तलाशी करवाई गई थी, लेकिन शहर से काफी दूर होने से यहाँ जाँच नहीं की गई थी। वैसे तो यदि वह लड़की यहाँ डूबी होती तो लाश पानी के ऊपर एक-दो दिन में ही आ जाती पर फिर भी एक बार यहाँ भी कोशिश क्यों न की जाये?' उन्हें धर्मिष्ठा की गुमशुदगी के रहस्य की चाबी यहाँ मिलने की सम्भावना नज़र आने लगी थी सो उन्होंने गोताखोरों को पानी में गहराई तक तलाशी करने का निर्देश दिया। दो घंटे के अथक प्रयास के बाद गोताखोर एक बड़े पत्थर के नीचे फँसी एक लाश और निकाल लाये। इस लाश से उठ रही बदबू के कारण पास में खड़े ग्रामीण व पुलिस के जवान भी एक बार तो दूर जा कर खड़े हो गये। लाश को देख कर उसका कोई परिचित भी उसे पहचान नहीं सकता था, क्योंकि पुरानी होने के कारण लाश सड़ तो गई ही थी, जल-जंतुओं ने भी उसे कई जगह से नोच खाया था। अलबत्ता यह अनुमान तो लग ही रहा था कि यह लाश किसी महिला की हो सकती है।

 साथ में लाई गई एम्बुलेन्स में दोनों लाशों को रखवा कर पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल में लाया गया। पुलिस के अनुमान से पुरानी वाली लाश धर्मिष्ठा की हो सकती थी। वकील गंगवाल साहब व मास्टर साहब प्रथमेश जी के परिवारों को शिनाख्तगी के लिए बुलाया गया। रूपेश को तो तुरंत पहचान कर वकील-परिवार बिलख पड़ा। उनके रिश्तेदार भी आये थे, जिन्होंने उन्हें सम्हाला।
प्रथमेश जी और उनकी पत्नी ने दूसरी लाश पर चीथड़े हो गये कपड़ों और फूले गले में धंस गई सोने की चैन के डिजाइन को देख कर धर्मिष्ठा की पहचान की। प्रथमेश जी ने कल्पना भी नहीं की थी कि उनकी लाड़ली इस रूप में उनके सामने होगी, वह फफक-फफक कर रो रहे थे और धर्मिष्ठा की माँ तो बेटी को इस हालत में देख कर बेहोश ही हो गई।

  पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यही ज्ञात हो सका कि दोनों की डूबने से ही मृत्यु हुई है। पुलिस दोनों की मौत में कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकी। रूपेश की मौत भी एक रहस्य बन गई। उसके माता-पिता इसे आत्महत्या मानने को तैयार नहीं थे, लेकिन हत्या जैसा कोई कारण और प्रमाण नहीं होने से पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला ही माना। शर्मिष्ठा की मौत को भी 'आत्महत्या' मान कर केस बंद कर दिया गया, जबकि उसके माता-पिता के भी यह बात गले नहीं उतर रही थी। 
  
अर्चना को इसके अगले दिन सुबह अख़बार से पता लगा कि धर्मिष्ठा व रूपेश की लाशें डकूचिया डैम से मिली हैं तो वह सिहर उठी, उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला, 'ओह धर्मिष्ठा, यह क्या हो गया? तू आत्महत्या नहीं कर सकती थी, तू तो औरों के लिए भी प्रेरणा-स्रोत हुआ करती थी, ज़िंदादिली की एक मिसाल थी तू तो! ...तो क्या किसी ने तेरे साथ ज़्यादती कर के तुझे मार डाला? क्या उस दिन रूपेश ने... या तीनों ने मिल कर... नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। तेरे जैसी प्यारी, मासूम लड़की के साथ कोई भी ऐसा कैसे कर सकता है? ... क्या हो गया धर्मिष्ठा? कैसे हो गया यह सब? ओह! क्यों मैंने तुझे अकेले जाने दिया उस दिन...क्यों?', वह सुबक-सुबक कर रोये जा रही थी। उसकी मम्मी ने उसके रोने की आवाज़ सुनी तो आ कर सम्हाला उसे।
 कॉलेज जाने का बिलकुल मन नहीं था अर्चना का, फिर भी वह शनिवार को कॉलेज गई। उसने कपिल व मोहनीश, दोनों से धर्मिष्ठा व रूपेश के बारे में पूछा तो कपिल ने बताया-  "हमारे साथ धर्मिष्ठा आ तो गई थी लेकिन ट्रीट कहाँ दी जाए, यह तय होने से पहले ही वह अचानक ही तुम्हारी गैरमौज़ूदगी के कारण बहुत परेशान होने लगी और आस-पास ही कहीं भी जल्दी से ट्रीट ले कर या बिना लिये ही घर लौटना चाहती थी। हार कर हमने पब्लिक गार्डन में ही उसे ट्रीट दी। थोड़ा मूड बन गया तो रूपेश और मोहनीश ने एक-एक गाना गया और फिर सब के आग्रह पर धर्मिष्ठा ने भी डान्स किया। देर हो गई थी सो रूपेश ने पहले हमें एयरपोर्ट छोड़ा और फिर वह धर्मिष्ठा के साथ एयरपोर्ट से लौट गया। हमें नहीं मालूम कि इसके बाद क्या हुआ। कुछ देर से पहुँचने के कारण उस दिन हमारी फ्लाइट मिस हो गई और हमें टैक्सी कर के वापस लौटना पड़ा था। अर्चना, अगर तुम किसी को यह बता दोगी कि धर्मिष्ठा उस दिन हमारे साथ गई थी तो पुलिस अनावश्यक रूप से हमें तंग करेगी, मारेगी-पीटेगी, जबकि हमें कुछ भी पता नहीं है कि उस दिन हमसे अलग होने के बाद वह दोनों कहाँ गये थे और धर्मिष्ठा के साथ क्या हुआ था? रूपेश की मौत के पीछे क्या कारण रहा, यह भी पुलिस की जाँच से ही पता लग सकेगा। प्लीज़ अर्चना, हमें किसी तकलीफ़ में मत डाल देना। देख न मोहनीश की तरफ, वह कितना नर्वस और परेशान है यह सब देख-जान कर!"

  कपिल ने सोचे-समझे ढ़ंग से अपनी नावाकिफ़ी बताने के लिए अपना गढ़ा हुआ स्पष्टीकरण दिया, किन्तु अर्चना फिर भी उसकी बात से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो सकी।
कपिल और मोहनीश सभी के साथ समान रूप से मिलते-जुलते रहते थे सो रूपेश से इनकी निकटता का भी किसी को ख़ास अंदाज़ा नहीं था। वह अब ज़्यादा साथ नहीं रहते थे, किन्तु कैन्टीन में अक्सर साथ दिख जाते थे। अर्चना भी कभी-कभी उनके साथ हो लेती थी। अब वह इन दोनों के कुछ निकट रहने की कोशिश करने लगी थी कि कुछ रहस्य हो तो पता लगे।
धर्मिष्ठा व रूपेश की मौत से सम्बन्धित समस्त घटनाक्रम के सूत्र थे तो केवल कपिल और मोहनीश के पास या फिर अर्चना को ही कुछ अनुमान हो सकता था, किन्तु इन तीनों के द्वारा इस तरह ख़ामोशी अख्तियार कर ली गई थी कि कोई भी एजेंसी मामले की टोह न पा सकी।

  पांच-छः दिन बाद जब वह अकेली कैन्टीन में गई तो देखा, कपिल और मोहनीश दूसरी तरफ मुँह किये अगल-बगल बैठे थे क्योंकि सामने वाली कुर्सी टूटी हुई थी। वह लोग धीरे-धीरे बातें कर रहे थे। कैन्टीन में अधिक लोग नहीं थे। अर्चना आहिस्ता से ठीक उनके पीछे वाली कुर्सी पर बैठ गई एवं एकाग्र हो कर उनकी बातें सुनने का प्रयास करने लगी कि शायद कुछ काम की बात हाथ लग जाये। 
 मोहनीश कह रहा था- "मुझे सपने में रोज़ धर्मिष्ठा दिखने लगी है। कभी-कभी तो दिन में भी मुझे लगता है कि वह मेरे आस-पास ही मौज़ूद है और मैं पागल-सा हो जाता हूँ। मुझसे बर्दाश्त नहीं होता यार। अपन ने उसके साथ बहुत बुरा काम किया था और फिर दूसरी ग़लती यह की कि उस बेचारी को डैम में फेंक दिया। रूपेश से तो उसने बदला ले ही लिया है। पता नहीं, अब अपना क्या होगा?..."
 अर्चना का अनुमान सही सिद्ध हुआ था, 'तो इन तीनों ने ही धर्मिष्ठा की जान ली और निश्चित ही उसके साथ कुकर्म भी...।'  तुरंत वह वहाँ से उठ खड़ी हुई और धीमे क़दमों से कैन्टीन से बाहर निकल आई। अब वह कॉलेज में नहीं रुक सकती थी, सीधी घर चली आई। मम्मी ने जल्दी आने का कारण पूछा तो क्लास नहीं होने का बहाना बना दिया। वह सीधी अपने कमरे में जा कर बिस्तर पर लेट गई और तकिये में मुँह छिपा कर फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने निश्चय किया कि अब उसे जल्दी ही पुलिस को सूचना दे देनी चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम वह अपने मन को मज़बूत कर लेना चाहती थी।

  इस घटना के तीसरे दिन सुबह अर्चना के हाथ में उस दिन का अख़बार था। मुखपृष्ठ पर छपी एक खबर की हैडलाइन चौंकाने वाली थी, लिखा था- 'शहर में तीसरी रहस्यमयी मौत'। उसने पूरा विवरण पढ़ा, जिसके अनुसार मोहनीश ने अपने पिता की लाइसेंसशुदा पिस्तौल से अपने सिर में गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी। अर्चना खबर पढ़ कर सिहर उठी, 'परसों कैन्टीन में मोहनीश की कपिल से हुई बात के अनुसार वह बेहद डरा हुआ ज़रूर था, किन्तु कल जब कॉलेज में उसे देखा था तो नॉर्मल ही दिख रहा था। फिर अचानक... इसका मतलब सच में ही धर्मिष्ठा अपना बदला ले रही है। यानी कि अब कपिल की बारी है।... लेकिन नहीं, कपिल थोड़ा सख्त जिगर का लड़का है, वह यूँ आतंकित होने वालों में से नहीं है।... '
 अर्चना का कपिल से मोह खत्म हो चुका था। उसे उससे हद दर्जे तक नफरत हो गई थी। सोचने लगी वह, 'क्या अब उसे अपनी ख़ामोशी तोड़ देनी चाहिए या धर्मिष्ठा के द्वारा कपिल से भी बदला लेने का इन्तज़ार करे वह? रूपेश के साथ क्या हुआ होगा? क्या धर्मिष्ठा सचमुच प्रेत बन कर बदला ले रही है? पुलिस क्या इसे भी महज आत्महत्या का मामला मान कर केस की तह में जाने की कोशिश नहीं करेगी? केवल मुझे मालूम है कि धर्मिष्ठा इन तीनों के साथ गई थी।... हे भगवान! क्या करूँ मैं?'

  मोहनीश की मृत्यु हुए दस-बारह दिन हो गये, लेकिन पहले वाले दोनों मामलों की तरह इस बार भी पुलिस अब तक कुछ भी मालूम नहीं कर सकी थी। तीनों मौतें एक ही क्लास के छात्रों से सम्बन्ध रखती थीं, अतः सभी को आत्महत्या मान कर केस को दफ्तर-दाखिल कर देना भी उसके लिए आसान नहीं था। वह अपने तरीके से मामले में हाथ-पैर मारने की कोशिश कर रही थी।

  अर्चना इन दिनों गुमसुम रहने लगी थी। उसका मन न तो घर में लगता था और न ही कॉलेज में। वह कई बार अकेले में रो पड़ती थी, उसे लग रहा था कि वह इस राज़ को अधिक समय तक अपने सीने में दबाये नहीं रख पायेगी। उसके मम्मी-पापा तो यही मान रहे थे कि अपने तीन-तीन सहपाठियों की एक के बाद एक मौत से वह आतंकित हो गई है, धीरे-धीरे सहज हो जाएगी।
 आज दिन भर से वह बहुत ज़्यादा बेचैन थी। रात को वह ठीक से सो भी नहीं सकी।  
  आखिर में अगली सुबह बिस्तर से उठते ही उसने अपनी मम्मी को आवाज़ लगाई। मम्मी के आते ही वह उनसे लिपट कर सुबक उठी, बोली- "मम्मी, मेरा सिर फट जायगा, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा। मुझे आपसे कुछ कहना है।"... और मम्मी के कुछ बोले बिना ही जो कुछ उसे पता था, सब उगल दिया। अंत में उसने कहा- "धर्मिष्ठा की मौत को एक माह होने को आया है। मैं सोच रही थी कि उन दोनों की तरह कपिल का भी स्वतः ही इन्साफ़ हो जायगा, लेकिन वह अभी भी खुली हवा में घूम रहा है। मैं पापा के साथ जा कर पुलिस को सब बताना चाहती हूँ मम्मा!"
  उसकी मम्मी की आँखें भर आईं- "उफ्फ़ बेटा, अपने नन्हे-से दिल में इतने लम्बे समय तक इतना दर्द समेटे हुए थी तू! तूने मुझे पहले ही यह सब बता दिया होता तो तेरा मन कुछ तो हल्का हो जाता। मैं तेरे पापा से आज ही बात करती हूँ। लगता है, रात को तू ठीक से सोई नहीं है। थोड़ी देर आराम कर, इतने में चाय बना कर तुझे बुलाती हूँ।"
  अर्चना की मम्मी ने उसके पापा को उसी दिन रात को सारी बात बताई। दोनों ने गहनता से विचार-विमर्श किया।
अगले दिन रविवार था, सब घर पर ही थे।
  सुबह के नाश्ते के बाद अर्चना के पापा ने उसे समझाते हुए कहा- "देख बिटिया, जो होना था सो हो चुका है। तहकीकात करना पुलिस का काम है। कपिल को उसके किये की सज़ा आज नहीं तो कल मिल ही जाएगी। कब तक बच सकेगा वह? हम लोग आगे चल कर दुश्मनी मोल क्यों लें। भूल जा तू सब-कुछ और खुद को सम्हाल! देख, क्या हालत कर ली है तूने अपनी?"
  "नहीं पापा, मैंने पहले ही बहुत बड़ी भूल कर चुकी हूँ। जानते हुए भी सब-कुछ छिपाया है मैंने। अब और खुद को भरमा नहीं सकती। एक तरह से मैं भी कहीं न कहीं गुनहगार हूँ धर्मिष्ठा की।... मैं उसे बचा तो नहीं सकती थी, लेकिन उसके  गुनहगार इतने समय तक खुली हवा में साँस लेते रहे, इसके लिए तो मैं ज़िम्मेदार हूँ ही। काश! मैंने उस दिन उसको रोक लिया होता तो मेरी प्यारी सहेली आज ज़िन्दा होती।... पापा, अगर आप मेरे साथ नहीं आएँगे तो मैं खुद जाऊँगी पुलिस के पास।"

  अर्चना के हठ से विवश हो कर उसके पिता ने थानेदार के पास जाने का निर्णय लिया। थानेदार साहब का खाता उनके ही बैंक में था सो अच्छा परिचय भी था उनसे। वह सोमवार को ड्यूटी पर जाने से आधा घंटे पहले थाने पर पहुँच गये।
  "आइये केशव देव जी, आज यहाँ कैसे आना हुआ?" अर्चना के पिता के अभिवादन के उत्तर में थानेदार ने सामने रखी फाइल से नज़र ऊपर उठा कर पूछा।
 केशव देव जी ने सारा ब्यौरा कह सुनाया जो भी बेटी से मालूम हुआ था। थानेदार के चेहरे पर आश्चर्य, क्रोध व प्रसन्नता के भाव इस दौरान एक-एक कर आते-जाते रहे।
  अपनी बात पूरी कर केशव देव ने हाथ जोड़ कर कहा- "देखिये साहब, मेरी बच्ची बहुत भोली है, डरी हुई भी है, फिर भी चाहती है कि उसकी सहेली को इन्साफ़ मिले और गुनहगार को सज़ा। मेहरबानी इतनी ज़रूर करें कि हम लोगों को किसी के गुस्से का शिकार न होना पड़ जाये।"
 "आप की बच्ची ने थोड़ी नासमझी तो की है, किन्तु उसने अब भी साहस से यह बात बता कर हमारे विभाग को  नाकामयाबी की शर्मिंदगी से बचाया है। आप आज ही बच्ची के साथ शाम को यहाँ आ जाएँ। मैं ढंग से उसके बयान करवा लेता हूँ। आप और किसी बात की कतई चिंता न करें, आपकी बच्ची, मेरी बच्ची है।”
 केशव देव संतुष्ट हो कर वहाँ से लौटे। 
   शाम को साढ़े छः बजे केशव देव अर्चना के साथ थाने पर पहुँच गये।
  अर्चना ने हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया। थानेदार ने एक बार और सारी बातें अर्चना के मुँह से सुनी और अपने एएसआई को बुला कर उसके बयान कलमबद्ध करवाये। जहाँ आवश्यक था, वहाँ बयान की भाषा में कुछ बदलाव भी करवाया। 
   बयान के दौरान वहीं पास में बैठी उपनिरीक्षक ने अर्चना के बयान हो जाने के बाद उससे कहा- “उन तीनों ने तुम्हारी सहेली की इज़्ज़त ली, उसकी हत्या भी कर दी, फिर भी तुम अभी तक यह राज़ दिल में दबा कर कैसे बैठी रही?”
  बिफर पड़ी अर्चना- “मैडम, इज़्ज़त मेरी सहेली की नहीं गई है। दो कौड़ी के संस्कारहीन लड़के उसकी इज़्ज़त कैसे ले सकते थे जिन्होंने उस मासूम को धोखे में रख कर अपनी नामर्दगी दिखाई थी। मैं नहीं जानती थी कि धर्मिष्ठा के साथ क्या हुआ था पर जब उसकी और रूपेश की लाशें मिलीं, तब मैं जानना चाह रही थी कि ऐसा कैसे हुआ था। बिना निश्चित हुए कि वह गुनहगार हैं, मैं शेष दोनों लड़कों के नाम पुलिस को देना नहीं चाहती थी क्योंकि मुझे आप लोगों के काम करने का ढंग पता है। धर्मिष्ठा तो बेचारी मर ही गई, किन्तु आपको नहीं मालूम, मैं स्वयं पिछले दिनों कितनी बार मरी हूँ।” -आक्रोश और पीड़ा के कारण अर्चना का स्वर रुंध गया था। 
  थानेदार ने उपनिरीक्षक को इशारे से खामोश रहने को कहा। 
  केशवदेव थानेदार को धन्यवाद दे कर अर्चना के साथ घर लौट आये। सब कुछ अच्छे से हो गया और अर्चना अपेक्षाकृत प्रसन्न थी, यह देख अर्चना की माँ भी स्वयं को हल्का महसूस कर रही थी। 
   
   केस को पूरी तरह तैयार कर पुलिस ने कपिल को धारा 302 व धारा 376 सपठित धारा 375 में गिरफ्तार किया।   प्रारम्भ में कपिल ने केस के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी होने से स्पष्ट इन्कार कर दिया, लेकिन बाद में पुलिस द्वारा सख्ती किये जाने पर पर वह टूट गया। उसके विस्तृत बयान लिये गये। उसके बयान का एक भाग अर्चना के बयानों के अनुरूप पाया गया। इसके अतिरिक्त कपिल ने अपने बयान में उन सबके द्वारा धर्मिष्ठा का बलात्कार किये जाने तथा उसे डैम में फेंके जाने से सम्बन्धित वाक़ये का समस्त विवरण तथा डैम पर रूपेश की मृत्यु से सम्बन्धित अपना आँखों देखा हाल भी कलमबद्ध करवाया था।

 अगले ही दिन सभी प्रमुख अख़बारों में तीनों की मृत्यु के आपसी सम्बन्ध व रूपेश की अजीबोगरीब मृत्यु का विस्तृत विवरण छप गया तथा टीवी में भी प्रदर्शित किया गया। यह समाचार जनता की उत्सुकता का समाधान तो बना पर साथ ही संजीदा लोगों के लिए विषाद का कारण भी बना। शहर में हुए यह हादसे कुछ दिनों के लिए हर घर में चर्चा का विषय बन गये। कई लोग इस बात से चमत्कृत थे कि धर्मिष्ठा के प्रेत ने अपना बदला लिया था और मान रहे थे कि यदि कपिल पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया होता तो प्रेतात्मा उससे भी बदला ले कर रहती। वहीं कई लोगों का मानना यह था कि अपराध-बोध से ग्रस्त हो कर ही उन दोनों अपराधियों ने आत्महत्या कर ली थी। 

  तीन दिन के भीतर पुलिस ने विधिवत रूप से कोर्ट में मुकद्दमा दर्ज करा दिया।
  कपिल के इकबालिया बयान तथा सरकारी गवाह बनी अर्चना की कोर्ट में कपिल के विरुद्ध पुख्ता गवाही के कारण मुकद्दमे का फैसला कोर्ट द्वारा मात्र आठ माह में सुना दिया गया। बचाव पक्ष का वकील मुकद्दमे में विशेष कुछ भी हासिल नहीं कर सका। केवल मात्र उसकी यह दलील कि उसके मुवक्किल की कम उम्र के मद्देनज़र उसे कम से कम सज़ा दी जाये, अवश्य ही न्यायालय द्वारा विचारार्थ रिकॉर्ड में ली गई थी। फैसले के अनुसार न्यायालय द्वारा कपिल की अल्पवय को ध्यान में रखते हुए उसे आठ साल की कैद बामुशक्कत व पच्चीस हज़ार रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया गया।

   कुदरत और न्याय ने तीनों गुनहगारों को अपने अंजाम तक पहुँचाया अवश्य, किन्तु एक यक्ष प्रश्न शहर के हर संजीदा व्यक्ति के मस्तिष्क में ज्वाला बन कर दहक रहा था कि अपराधियों को सज़ा भले ही मिल गई, किन्तु उन दुष्टात्माओं को ईश्वर की एक कृति का अस्तित्व ही मिटा देने का अधिकार किसने दिया था? क्या उस मासूम को उसका जीवन लौटाया जा सकेगा? क्या धर्मिष्ठा के माता-पिता को उनकी बेटी वापस मिल सकेगी? उन अपराधियों के परिवार-जन और धृतराष्ट्र बना हमारा यह समाज कब तक ऐसे अपराधों का बोझ अपने दिलों पर ढ़ोता रहेगा? इसमें दोष किसका है?... ऐसे लड़कों की परवरिश का?... शराब का?... या फिर आज के युग में पनप रही स्वच्छंदता का? कब तक ऐसे शोहदे मासूम बच्चियों के शरीर और जीवन से खिलवाड़ करते रहेंगे?... आखिर कब तक?


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  1. आदरणीया/आदरणीय आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर( 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३ हेतु नामित की गयी है। )

    'बुधवार' ०६ मई २०२० को साप्ताहिक 'बुधवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य"

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  2. जी आपनी अपनी कहानी के माध्यम से वह
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  4. मेरी रचना को सम्मान देने व तदर्थ सूचना प्रदान करने हेतु आपका आभार प्रिय महोदय!

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  5. आदरनीय सर, आज लोकतन्त्र संवाद पर आपकी ये रोचक और मार्मिक देखकर बहुत खुशी हुई।मेरी शुभकामनायें स्वीकार करें। सादर प्रणाम🙏🙏🙏

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छुटंकी लाल (कहानी)

     शहर का बहुत पुराना मोहल्ला था वह। निम्नवर्ग, मध्यम वर्ग तथा उच्च मध्यम वर्ग, के, शिक्षित, अल्पशिक्षित, सभी प्रकार के परिवार इस मोहल्ले में रहते थे। सभी लोग अपने-अपने ढंग से अपना जीवन जी रहे थे। मोहल्ले के एक हिस्से में कुछ खाली जमीन पड़ी थी, जिस पर मोहल्ले के कुछ समर्थ लोगों ने कुछ तो अपने अंशदान से तो कुछ प्रशासन की मदद से एक छोटा-सा पार्क बनवाया था। पार्क में चार पत्थर की बेंच भी बनवाई गई थीं, जिन पर यदा कदा शाम के समय मोहल्ले के कुछ लोग आकर बैठते, बतियाते थे। पार्क की मुलायम दूब पर कुछ बच्चे उछलते-कूदते और खेला करते थे। उन्हीं बच्चों में से एक बारह वर्षीय छुटंकी लाल भी था।    छुटंकी लाल को बचपन में उसके माता-पिता 'छुटकू' कह कर पुकारते थे। जब वह आठ वर्ष का हुआ तो उसके छोटे भाई ने जन्म लिया। नये नन्हे मेहमान को घर में सब 'ननकू' कहने लगे। अब क्योंकि घर में एक छोटा सदस्य और आ गया था तो छुटकू ने अपना नाम 'छुटंकी लाल' मनोनीत कर मोहल्ले में घोषित भी कर दिया। शायद उसकी इस घोषणा को ही उसके माता-पिता ने उसका नामकरण संस्कार मान लिया था। कुछ लोग उसकी ख़ुशी देख कर उसे

"ऐसा क्यों" (लघुकथा)

                                   “Mother’s day” के नाम से मनाये जा रहे इस पुनीत पर्व पर मेरी यह अति-लघु लघुकथा समर्पित है समस्त माताओं को और विशेष रूप से उन बालिकाओं को जो क्रूर हैवानों की हवस का शिकार हो कर कभी माँ नहीं बन पाईं, असमय ही काल-कवलित हो गईं। ‘ऐसा क्यों’ आकाश में उड़ रही दो चीलों में से एक जो भूख से बिलबिला रही थी, धरती पर पड़े मानव-शरीर के कुछ लोथड़ों को देख कर नीचे लपकी। उन लोथड़ों के निकट पहुँचने पर उन्हें छुए बिना ही वह वापस अपनी मित्र चील के पास आकाश में लौट आई। मित्र चील ने पूछा- “क्या हुआ,  तुमने कुछ खाया क्यों नहीं ?” “वह खाने योग्य नहीं था।”- पहली चील ने जवाब दिया। “ऐसा क्यों?” “मांस के वह लोथड़े किसी बलात्कारी के शरीर के थे।” -उस चील की आँखों में घृणा थी।              **********

फेल होने की मिठाई (लघुकथा)

बच्चों की अंकतालिका देने के लिए सभी अभिभावकों को स्कूल में बुलाया गया था। अतः शिवचरण भी अपने बेटे राजीव के स्कूल पहुँचे। आज स्कूल में छोटी कक्षाओं के बच्चों का परीक्षा-परिणाम घोषित किया जाने वाला था।  शिवचरण अपने बच्चे का परीक्षा-परिणाम पहले से ही जानते थे और इसीलिए उदास निगाह लिये प्रधानाध्यापक के कक्ष में पहुँचे। प्रधानाध्यापक ने उनका स्वागत किया और वहां पर बैठे अन्य  सभी अभिभावकों के साथ उन्हें भी स्कूल के मैदान में पहुँचने के लिए कहा गया।  एक माह पूर्व राजीव के सिर में बहुत तेज दर्द हुआ था और एक प्रतिष्ठित डॉक्टर के क्लिनिक में जाँच कराने पर पता चला था कि बच्चे के मस्तिष्क में कैंसर है, जो तीसरी स्टेज में है। शिवचरण एक प्राइवेट स्कूल में लिपिक थे जहाँ से प्राप्त हो रहे वेतन से बामुश्किल परिवार का गुज़ारा होता था। राजीव का कोई महँगा इलाज करना उनके बस की बात नहीं थी, सो एक वैद्य की सलाह से वह राजीव को काली तुलसी का रस और जवारे का रस पिला कर जैसे-तैसे राजीव का इलाज करने का टोटका कर रहे थे। साथ ही वह और उनकी पत्नी ईश्वर से राजीव के जीवन के लिए दिन-रात प्रार्थना करते थे। राजीव को उन्होंन