वही शाम का वक्त था, सूर्यास्त होने में अभी कुछ देर थी और मैं रोज़ाना के अपने नियम के अनुसार फतहसागर झील की पाल पर टहल रहा था। मन्द-मन्द चल रही हवा झील के पानी में धीमा-धीमा स्पन्दन उत्पन्न कर रही थी। कभी मैं झील की सतह पर प्रवाहित लहरों को निहार लेता था तो कभी मेरी नज़र पाल के किनारे बनी पत्थर की बैन्च पर बैठ गप-शप कर रहे लोगों पर पड़ जाती थी। मैं अपनी दिन-भर की थकान व दुनियादारी के तनाव से मुक्ति पाने के लिए यहाँ टहलने आता था, सेहत बनाने के लिए तेज़ रफ़्तार से वॉकिंग करना मेरा उद्देश्य कतई नहीं था। वैसे भी मैं छरहरी कद-काठी का इन्सान हूँ सो मेरी समझ से मुझे अधिक स्वास्थ्य-चेतना की ज़रुरत नहीं थी। तो आज भी यूँ ही टहल रहा था कि एक बैन्च पर एकाकी बैठी एक महिला पर मेरी नज़र पड़ी। उस महिला का चेहरा देख कर ऐसा लगा जैसे उसे कहीं देखा है। दिमाग पर ज़ोर लगाकर कुछ याद करने की कोशिश करता, इसके पहले ही मैं कुछ आगे निकल चुका था। उसे पहचानने के लिए तुरत...