आपको उद्वेलित कर देगी मेरी यह कहानी!... बहुत भोला होता है बचपन! कभी-कभी वास्तविकता से परे काल्पनिक रचनाओं, समाज में व्याप्त आडम्बरों और भ्रान्त विश्वासों का अवाञ्छित प्रभाव बाल-मन को दुष्प्रेरित कर अनर्थ के गर्त में धकेल देता है और पीछे रह जाती है परिजनों की अपरिमार्जनीय व्यथा! प्रस्तुत है एक बालक के मनोवेग का चित्रण करती यह करुण कहानी- 'ख़याली दुनिया' ..... प्रेरणा अपने ऑफिस में बैठी एक महत्वपूर्ण फाइल देखने में व्यस्त थी कि टेबल पर रखा उसका मोबाइल फोन फिर बज उठा। अभी-अभी में तीन-चार जगह से कॉल आ चुके थे सो उसने झुंझला कर बिना देखे ही फोन काट दिया। पाँच-सात सेकंड में दुबारा मोबाइल घनघनाया। 'ओफ्फोह' उसके मुँह से निकला और फोन उठा लिया। उधर से उसके पति सुदेश की उखड़ी-उखड़ी आवाज़ आई- "प्रेरणा, फोन क्यों काट रही हो? जल्दी से जनरल हॉस्पिटल पहुँचो।" "अरे, क्या हो गया? ठीक तो हो तुम?"- घबरा कर प्रेरणा ने पूछा। " हाँ, मैं ठीक हूँ, पर तुम तुरन्त रवाना हो जाओ और हॉस्पिटल ...