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बहुत हो गया...



   गहन अध्ययन और शोध के उपरान्त यह तथ्य उजागर हुआ कि भक्तों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-    1) सामान्य भक्त
                  2) अन्ध भक्त
    तो मित्रों, सन्दर्भ है अभी हाल ही दिल्ली में हुए चुनावों का। चुनाव के परिणामों के बाद सामान्य भक्तों ने वस्तु-स्थिति को समझा, गुणावगुणों के आधार पर अपने भक्ति-भाव की समीक्षा की और अन्ततः सत्य को स्वीकार कर केजरीवाल की विजय का स्वागत भी किया। सत्य की राह पर आने के लिए उन्हें हार्दिक बधाई!
   अन्ध भक्त अखाड़े में उतरे उस दम्भी पहलवान के समान हैं जो चित्त होने के बाद भी अपनी टांग ऊँची कर कहे कि वह हारा नहीं है। यह लोग 'खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे' के ही अंदाज़ में अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं मानो सच्चाई को ही बदल देंगे। इनको कोई समझाए कि वह उनके नेताओं के झूठ, चापलूसी व अकर्मण्यता से उपजी विफलता को समझें और स्वीकारें।
   जितना झूठ और विष केजरीवाल के विरुद्ध उंडेला गया, जितनी भ्रान्तियाँ उनके विरुद्ध फैलाई गईं, उसके कारण जनता में उपजा आक्रोश केजरीवाल को प्राप्त होने वाले वोटों में तब्दील होता चला गया। इसीलिए हालत यह हो गई है कि दिल्ली की विधान सभा तक पहुँचने के लिए बीजेपी से जीते तीनों माननीय सदस्यों को वाहन के रूप में मात्र एक मोटर साइकिल की ही ज़रुरत होगी। अन्ध भक्तों ! पैट्रोल बचाने वाली यह राहत भी नहीं  मिलने वाली है क्योंकि केजरीवाल के शासन में माननीय होने की हैँकड़ी दिखाकर क़ानून तोड़ने की इज़ाज़त नहीं होगी। शून्य के बजाय तीन का आंकड़ा भी सम्भवतः जनता के ऐसे तबके के कारण नसीब हुआ है जो केजरीवाल के विरुद्ध बिछाए गए भ्रमजाल में उलझ कर भ्रमित हो गया था।
   मैं समझता हूँ, तीन तक सीमित संख्या चार तक पहुँच सकती थी यदि केजरीवाल के भगोड़े होने के सबूत के रूप में अन्य की तरह निम्नांकित वाकयों को भी उनके विरुद्ध इस्तेमाल किया गया होता -
  1) वह क्रिकेट में बैटिंग करके विकेट्स के बीच पिच पर तथा फील्डिंग करते वक़्त बॉल के पीछे भागे थे।
  2) वह अपने स्कूल के दिनों में 100 मीटर race में भी भागे थे।
 बहुत हो गया अंध भक्तों, अब पांच वर्षों तक चादर तान कर सो जाओ और खर्च हो चुके ज़हर को अपने दिमाग में दुबारा पैदा करो, पांच साल बाद फिर ज़रुरत होगी विषवमन करने की।

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