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तन्हाई (ग़ज़ल)

मेरी एक नई पेशकश दोस्तों ---



तन्हाई




मौसम बेरहम देखे, दरख़्त फिर भी ज़िन्दा है,

बदन इसका मगर कुछ खोखला हो गया है।

 

बहार आएगी कभी,  ये  भरोसा  नहीं  रहा,

पतझड़ का आलम  बहुत लम्बा हो गया है।

 

रहनुमाई बागवां की, अब कुछ करे तो करे,

सब्र  का  सिलसिला  बेइन्तहां  हो  गया  है। 

 

या तो मैं हूँ, या फिर मेरी  ख़ामोशी  है यहाँ,

सूना - सूना  सा   मेरा   जहां  हो  गया  है। 


यूँ  तो उनकी  महफ़िल में  रौनक़ बहुत है,

'हृदयेश' लेकिन  फिर भी तन्हा  हो गया है।



                         *****



 



Comments

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" बुधवार 22 मई 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

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    1. हार्दिक धन्यवाद महोदया!

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  2. वाह | चौथी लाइन में गया करलें |

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  3. वाह, बेहतरीन शायरी !

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  4. बहुत बहुत सुन्दर गजल

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    1. सराहना के लिए हृदयतल से धन्यवाद

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  5. बहुत खूब 👌👌

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