बरसों के बाद बरसों के बाद वह सामने खड़ी थी- उसी अधूरी मुस्कान के साथ, जिसे मैं छोड़ आया था समय के किसी मोड़ पर। आँखों में सवाल नहीं थे, होंठों पर शिकवा भी नहीं, बस एक अनकही दास्तां, जो अब भी वैसी ही थी। मैंने देखा उसे और उसने मुझे- जैसे दो टूटी हुई पंक्तियाँ फिर से कविता बन जाएँ। वक़्त बीच में बहुत कुछ लिख गया, झुर्रियाँ, तजुर्बे, तन्हाइयाँ… पर दिल की किताब में दर्ज था अब भी नाम वही पहला-पहला। हम बोले नहीं, क्योंकि कुछ मुलाक़ातें आवाज़ नहीं माँगतीं, सुनती हैं सिर्फ़ धड़कनें। बरसों के बाद दो दिल आमने-सामने थे- और साथ में थी, मौन में लिपटी हुई एक पूरी उम्र। ***** © 2026 गजेन्द्र भट्ट 'हृदयेश' | सर्वाधिकार सुरक्षित।