किसी खड़खड़ के चलते अहमद की नींद अचानक खुल गई। आँखें मलते हुए उसने उठ कर देखा, कमरे में बेभान सो रही उसकी बेगम रशीदा के अलावा और कोई नहीं था। घड़ी में देखा, रात के दो बज रहे थे। धीमे क़दमों से वह खिड़की की ओर बढ़ा और बाहर निगाह डाली तो चौंक पड़ा, पड़ोसी कासिम की खिड़की अधखुली थी। उसे ताज्जुब हुआ, 'कासिम का परिवार ईद मनाने के लिए दो दिन के लिए आज ही अपने गाँव गया है और वह लोग अपनी सभी खिड़कियाँ बंद कर के गये थे, फिर इनकी खिड़की खुली कैसे पड़ी है?' ध्यान से सुनने की कोशिश की तो आहिस्ता-आहिस्ता बोलने की आवाज़ भी उसे सुनाई दी। कुछ ही देर में कासिम के कमरे में दो पल के लिए एक रोशनी झपकी। 'शायद मोबाइल की टॉर्च की रोशनी थी',अहमद ने अंदाज़ लगाया। वह समझ गया, कासिम के घर में चोर घुस आये हैं। चाँदनी रात थी और कासिम के घर के पीछे से आ रही बादलों में छिपे चाँद की रोशनी दोनों मकानों के बीच के गलियारे को हल्का-सा रोशन कर रही थी, लेकिन कासिम के कमरे में रोशनी नहीं के बराबर थी। वह यूँ ह...
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 31 मार्च 2022 को लिंक की जाएगी ....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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धन्यवाद... आभार बन्धु रवीन्द्र जी! अवश्य ही उपस्थित रहूँगा।
Deleteएक कवि का प्रेम कभी कम नहीं होता अपनी कविताओं से. वह आखिर रूठ कर जाएगा भी कहाँ तक
ReplyDeleteबहुत सुन्दर
बहुत- बहुत धन्यवाद महोदया!
Deleteआपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज बुधवार (01-04-2022) को चर्चा मंच "भारत ने सारी दुनिया को, दिया शून्य का ज्ञान" (चर्चा अंक-4387) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
मेरी इस साधारण -सी रचना को चर्चा-मंच पर स्थान देने के लिए आभारी हूँ। मैं अवश्य उपास्थित रहूँगा महोदय!
Deleteबहुत सटीक ...कवि के लिए कविता प्रेयसी से कम नहीं...
ReplyDeleteवाह!!!
धन्यवाद सुधा जी! कवि के लिए आराध्या है उसकी कविता!
Deleteसटीक। कवि के लिए तो कविता का आना एक प्रेमिका के आने के समान है।
ReplyDeleteसच कहा बन्धु आपने! कविता वस्तुतः प्रेमिका से कमतर प्रेयसी नहीं।
Deleteबहुत सुन्दर कविता
ReplyDeleteधन्यवाद मनोज जी!
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