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आरक्षण रूपी दानव



 आरक्षण-व्यवस्था को संविधान में स्थान मिलने का गुणगान लोग, विशेषकर सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ भले ही करते हों, मैं तो इसे बहुत बड़ी ऐतिहासिक भूल मानता हूँ। उद्देश्य कितना ही अच्छा क्यों न रहा हो, तब की यह नादान भूल आज देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गई है। इस व्यवस्था का लाभ शुरुआत में अजा-अजजा वर्गों के लोगों को तो मिल ही रहा था, धीरे-धीरे अन्य वर्गों की जीभ भी लपलपाने लगी इस शहद के छत्ते को पाने के लिए। सत्तासीन सरकारों की सीमाओं और जनता की सुविधा-असुविधा के विवेक को अनदेखा कर समय-समय पर भारतीय समाज के कुछ अन्य वर्गों ने भी अपने-अपने लिए आरक्षण की न केवल मांग की, अपितु इसे प्राप्त करने के लिए किये गए आन्दोलन को जन-बल के आधार पर अराजक और हिंसक रूप देने में भी कोई संकोच नहीं किया। आरक्षण के लिए गुर्जरों के द्वारा हिंसक आन्दोलन किये जाने के बाद पटेलों द्वारा और अब जाटों के द्वारा यह पुनीत कार्य किया गया। हद तो यह हो रही है कि कर्फ्यू के दौरान आधी रात को लोगों के घरों में घुस कर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ भी इनके आंदोलन का हिस्सा बन गई थी। पशुता की पराकाष्ठा तो यहाँ तक हो गई कि आन्दोलनकारियों में से ही कुछ गुण्डों ने सड़कों पर जा रहे वाहनों से उतार कर कई महिलाओं से बलात्कार तक कर डाला।
    दुर्बुद्धि नेताओं द्वारा पथभ्रमित कुछ युवाओं के द्वारा अनुचित, देश-विरोधी (?) नारे लगाने को देशद्रोहिता कहा जाना तर्कसम्मत है, कानूनसम्मत भी है और उनके विरुद्ध कार्यवाही भी होती है, लेकिन आंदोलन के अन्तर्गत सार्वजनिक सम्पत्ति को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करना यथा, रेल की पटरियां उखाड़ना, बसें जलाना और ऐसे ही अन्य हिंसक कार्य करना 'देशद्रोहिता' नहीं लगता, न तो सरकार को और न ही कानून को।
    देश क्या है ? राष्ट्र किसे कहते हैं ? मात्र जमीन और सीमाओं से घिरा क्षेत्र राष्ट्र नहीं होता। किसी भी भौमिक क्षेत्र को उसमें रहने वाले व्यक्तियों की भावनाएं, पारस्परिक व्यवहार, निजी सम्प्रभुता की रक्षा एवं वैयक्तिक व सामूहिक विकास की समग्र सोच एक सम्पूर्ण इकाई बनाती हैं और इन सबका सम्पोषण होने पर ही एक राष्ट्र की अवधारणा को जन्म मिलता है।
   निजी हित में राष्ट्रवाद, देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा तय करने वाले स्वार्थपरक राजनीतिज्ञों का मुखौटा उजागर करना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
   मैं समझता हूँ एक और आपातकाल चाहिए इस देश को, और वह भी केवल और केवल आरक्षण के दानव का उन्मूलन करने के लिए।
   

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