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छोटी-सी गुज़ारिश !

    एक टोकरी में अंगूर, एक टोकरी में आम, एक टोकरी में ताज़ा संतरे और एक टोकरी में मिश्रित फल रखे हुए थे। अंगूरों वाली टोकरी में 40%, आम वाली टोकरी में 70%, संतरों वाली टोकरी में 1 से 2% तथा मिश्रित फलों वाली टोकरी में 95% फल सड़े हुए थे। मैंने अपने एक मित्र से जो काफी सुलझे व्यक्तित्व का मालिक था, पूछा- 'दोस्त, अपने लिए किस टोकरी के फल चुनोगे ?'    मित्र बोला- 'यह कैसा प्रश्न है ? निश्चित ही संतरों वाली टोकरी के।'    मैंने प्रश्न को संशोधित किया- 'लेकिन यदि संतरों वाली या किसी भी अन्य टोकरी के फल तुम्हारी ज़रुरत से कम हों तो क्या करोगे ?'   मित्र ने हँसते हुए जवाब दिया- 'भाई तुम भी यार कुछ बोर्नवीटा वाला दूध पीया करो। कैसा सवाल पूछते हो ? सीधी-सी बात है, 95% सड़े फलों वाली टोकरी को तो हाथ ही नहीं लगाऊंगा और शेष तीनों टोकरियों में से सड़े फलों के अलावा सभी फलों को अपने लिए छांट लूंगा, वेरायटी भी होगी और अलग-अलग स्वाद भी।'     मैं प्रशंसा-भाव से उसकी ओर देखता ही रह गया।    मेरे अच्छे दोस्तों, उपरोक्त ...

प्रत्युत्तर

  मुझसे मेरे मित्रों ने पूछा कि भाई आप तो राजनैतिक स्वच्छता की बहुत बातें करते हो फिर मोदी जी के लिए जहरीली और हिंसक भाषा का प्रयोग कर साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने  का प्रयास करने वाले कॉन्ग्रेसी उम्मीदवार (सहारनपुर से) इमरान मसूद के बारे में कुछ क्यों नहीं लिखा। मैंने उन्हें बताया कि मैं केवल इन्सानों के बारे में लिखना पसंद करता हूँ। 

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    देश के शीर्षस्थ नेता स्वस्थ राजनैतिक परम्परा का निर्वाह न कर एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं, शब्दों के प्रयोग में अभद्रता की पराकाष्ठा को छू रहे हैं..... प्रत्येक बुद्धिजीवी के लिए विचारणीय बिन्दु है यह। लेकिन अफ़सोस ! हमारे देश के ऐसे नेताओं की जीत का कारण अन्य लोगों के अलावा बुद्धिजीवी भी होते हैं। 

विभीषणों को पहचानो…

   जहाज डूबने की सम्भावना देखकर सबसे पहले चूहे जहाज छोड़ कर भागने लगते हैं, उसी जहाज को जहाँ से अभी तक उन्हें दाना-पानी मिल रहा था।.…धिक्कार है ऐसे अवसरवादियों को !    प्रीत परायों से जो करके अपनों को देता है छोड़,   अवसर पाकर पूत पराये, उसको देते तोड़-मरोड़। 

बेशर्मी का यह दौर.…

 अपराधियों और दागियों को लोकसभा के टिकट दिए जा रहे हैं। राजनैतिक दल हद-दर्जे के निर्लज्ज होते जा रहे हैं, इन्हें जिताऊ उम्मीदवार चाहिए चाहे वह खूनी या बलात्कारी ही क्यों न हो। जिस विपक्षी पार्टी को पानी पी-पी कर कोसते हैं उसी से आये भगोड़ों को अपने में आत्मसात करने में कोई शर्म-झिझक नहीं। जनता को ठेंगे पर रखते हैं, बेवकूफ समझते हैं यह लोग। बहुत हो गया.....अब जनता को ही पहचाननी है इनकी असलियत। फिर भी...फिर भी अगर ऐसे लोगों को वोट जनता ने दिया तो उसे भुगतना ही होगा अगले पांच वर्षों तक.…और.…और.....जारी रहेगा यह सिलसिला आगे भी , ऐसे ही.… 

राजनीति का गिरता स्तर

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने नरेन्द्र मोदी (बीजेपी) के लिए निहायत ही अभद्र (लेखन योग्य नहीं) शब्द का प्रयोग किया और इस बेहूदगी के लिए उन्हें कोई अनुताप भी नहीं है । इस वाकिये पर सब लोग 'थू-थू' कर ही रहे थे कि नपा-तुला बोलने के लिए जाना जाने वाले म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कुछ ऐसी ही अभद्रता कर डाली। मोदी और राहुल गांधी की तुलना करते हुए उन्होंने मोदी को 'मूंछ का बाल' तो राहुल को 'पूँछ का बाल' कह दिया। भाई शिवराज जी, आपने शहजादे (आपकी जमात तो यही नाम देती है राहुल को) की शान में ऐसी गुस्ताखी कैसे कर डाली ?     राजनीति में शालीनता के आदर्श उदाहरण स्व. डॉ. राजेंद्र प्रसाद, स्व. लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी बाजपेयी जैसे कुछ महान नेताओं के बाद अब तो छिछलापन ही छिछलापन रह गया है। आज राजनीति में शुचिता दिया लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलती।     राजनीति के मैदान में उतरने के बाद जो बिछात लगाई जाती है उसमें कई तरह की पैंतरेबाजी होती है, आलोचना-प्रत्यालोचनाएं...