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Showing posts from January, 2026

जिजीविषा (कहानी)

जिजीविषा   जिजीविषा-- यह केवल जीवन की इच्छा नहीं, बल्कि उस अदम्य ज्वाला का नाम है, जो मृत्यु के साये में भी जीवन का संकल्प बनकर धधकती है। यह कहानी है दो मासूम भाई-बहन की, जो भूख, भय और अंधेरे से घिरे हैं। उनके भीतर है एक ऐसी जिजीविषा जो उन्हें टूटने नहीं देती। जब शब्द चुप हो जाते हैं, तब आँखें बोलती हैं। जब पेट की ज्वाला हड्डियों तक पहुँचती है, तब आत्मा संघर्ष का शंखनाद करती है। सुबह के आठ बज रहे थे। कस्बे के बाहरी इलाके में रहने वाले भाई-बहन, रवि और रीना अपने घर से  नाश्ता कर के बाहर खेलने निकल पड़े थे। उनकी माँ अपने कामों में व्यस्त थी। सूरज की किरणें कस्बे की गलियों में फैल रही थीं। रवि बारह वर्ष की उम्र का था और रीना आठ वर्ष की थी। रवि हमेशा छोटी बहन रीना का बहुत ख़याल रखता था। रीना शरारती थी, लेकिन अपने भाई को बहुत प्यार करती थी। वह भाई से कभी जुदा नहीं रह सकती थी। दोनों खेलते-खेलते अपनी ही धुन में, कस्बे के बाहर एक सुनसान रास्ते पर बढ़ते चले गए। रास्ते से कुछ दूरी पर वहाँ एक पुराना गोदाम था, जो किसी व्यवसायी का था। गोदाम महीनों में खुला करता था। इसके दरवाज़े का एक प...

विषय एक - रचनाएँ दो (लघुकथा और कविता )

      एक खामोशी  (लघुकथा) सड़क शांत थी। पेड़ों की छाया लंबी होकर दोनों बच्चों के करीब उतर आई थी। एक बच्चा नंगे पाँव, मैले कपड़ों में लकड़ी के एक डिब्बे पर बैठा था। दूसरा, साफ़, उजले कपड़ों में उसके सामने एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा था। पॉलिश की गंध हवा में घुल रही थी। लड़के के हाथ छोटे थे, पर गति में बिजली थी। ब्रश जूते पर ही नहीं, उसके खयालों में भी चलता जा रहा था। “तुम स्कूल जाते हो?” -खड़े लड़के ने अचानक पूछा। बैठे लड़के का हाथ क्षण भर के लिए रुका - “पहले जाता था।” “अब क्यों नहीं?” कुछ पल चुप्पी रही। बह रही हवा ने पेड़ों के पत्तों को छुआ और टकराकर लौट गई। खड़े लड़के ने दूसरा जूता आगे बढ़ा दिया। काम पूरा हुआ और खड़े लड़के ने जेब से पैसे निकाले। बैठे लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया। एक क्षण के लिए हाथों का स्पर्श… फिर, एक खामोशी ! पर हाँ, उस एक स्पर्श ने संवाद पूरा कर दिया। खड़ा लड़का उसके स्कूल चला गया। दूसरा लड़का वहीं बैठा रहा। पेड़ वहीं रहे, सड़क वहीं रही, बस बैठे लड़के की निगाह सड़क के इस ओर से उस ओर घूमती रही। ***** कविता    फासला   एक सड़क, दो बच्चे,...