मैंने देखा है विश्व-पटल पर उभरते मेरे देश के समग्र विकास को - सुदूर किसी गांव में कहीं एकाध जगह लगे हैंडपम्प से निकलती पतली-सी धार और पास में घड़े थामे पानी के लिए आपस में झगड़ती ग्रामीण बालाओं की कतार में; शहर में सर्द रात में सड़क के किनारे पड़े, हाड़ तोड़ती सर्दी से किसी असहाय भिखारी के कंपकपाते बदन में; कहीं अन्य जगह ऐसी ही किसी विपन्न, असमय ही बुढ़ा गई युवती के सूखे वक्ष से मुंह रगड़ते, भूख से बिलबिलाते शिशु के रूदन में; किसी शादी के पंडाल से बाहर फेंकी गई जूठन में से खाने योग्य वस्तु तलाशते अभावग्रस्त बच्चों की आँखों की चमक में; और....…और इससे भी आगे, विकास की ऊंचाइयों को देखा है - पड़ौसी मुल्कों की आतंकवादी एवं विस्तारवादी...