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जुलाई, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरे शहर के मवेशी

शहर की यातायात व्यवस्था को दुरुस्त रख रहे हैं मेरे शहर के मवेशी। उन छोटे-छोटे चौराहों-तिराहों पर जहाँ यातायात-कर्मी नहीं होते हैं, मवेशी बीचों-बीच बैठकर दाएं-बाएं का यातायात व्यवस्थित रखते हैं और कहीं-कहीं तो सड़क के बीच कतार में खड़े हो कर या बैठ कर बाकायदा डिवाइडर भी बनाये रखते हैं। सड़कों पर बेतहाशा दौड़ रहे वाहनों की तीव्र गति को सीमित करने के लिए यदा-कदा यह मवेशी सड़कों पर इधर-उधर टहलते भी रहते हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी सन्तुष्ट हैं संभवतः यही सोच कर कि यातायात-व्यवस्था की देख-रेख में इतनी मुस्तैदी तो यातायात-कर्मी भी नहीं दिखा पाते हैं। तो दोस्तों, आओ और देखो हमारे शहर की इस सुव्यवस्था को... 'दो दिन तो गुज़ारो हमारे शहर में ***********

मज़ाक बना रखा है...

    सरकार में मंत्री और ऐसे ही अन्य पद ग्रहण करते समय तथा अदालतों में फरयादी और मुल्जिम द्वारा ईश्वर के नाम पर ली जाने वाली शपथ की उपयोगिता मेरी समझ में तो नहीं आती। दोनों ही मामलों में अधिकांश लोगों के द्वारा झूठी और केवल झूठी शपथ ली जाती है और ऐसा झूठ बाद में प्रमाणित हो जाने पर भी झूठ बोलने के लिए कोई सजा नहीं दी जाती। ऐसी शपथ हास्यास्पद ही नहीं, पाप की श्रेणी में आती है।    बेहतर तो यह है कि शपथ में तो कम से कम सच्चाई रहे और इसके लिए शपथ का प्रारूप निम्नानुसार होना चाहिए - " मैं ईश्वर के नाम पर शपथ लेता / लेती हूँ कि मैं जो कुछ कहूंगा / कहूँगी अथवा करूँगा / करुँगी वह केवल और केवल मेरे और मेरे परिवार के हित के लिये होगा ( देश, समाज और मानवता जायें गुइयाँ के खेत में )।"